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Sunday, 31 October, 2010

आखिर कब लोटेंगे गुलमर्ग की वादियों में अपने घर कश्मीरी पंडित (२० साल वनवास के )


आज सम्पूर्ण भारत में कश्मीर की समस्याओ को लेकर बहस जारी है लेकि कश्मीरी पंडितो के समस्याओ को लेकर तो प्रशासन ही गंभीर है और ही देश का बुद्धिजीवी वर्ग वैसे कश्मीर व कश्मीर की समस्याओं के लिए हमारे देश का कथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग निरंतर प्रयास करता रहता हैं जिसका जीवंत उदहारण अरुंधती राय जी का विचार व कश्मीर को अधिक स्वायता देने की मांग करता हुआ जस्टिस शगीर अहमद की रिपोर्ट हैं । मगर इस प्रकार के बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा कश्मीरी पंडितो के घर वापसी को लेकर न तो किसी प्रकार की मांग उठाई जाती है नहीं कोई संवेदना या प्रतिक्रिया ही सामने आती है । अगर कोई इस प्रकार का प्रयास करता भी है तो उसे सांप्रदायिक कहा जाता है।

भारत जहाँ भगवान् श्री राम को भी 14 वर्ष के वनवास के बाद घर वापसी का स्वभाग्य प्राप्त हो गया था। उसी देश में कश्मीरी पंडितो को अपने घर कश्मीर को छोड़े हुए २० वर्ष बीत गए लेकिन घर वापसी की राह अभी भी अंधकारमय है । लगभग 7 लाख कश्मीरी परिवार भारत के विभिन्न हिस्सों व् रिफूजी कैम्प में शरणार्थियो की तरह जीवन बिताने को मजबूर है। लेकिन इनका दर्द लगता है शासन कर्ताओं को नज़र नहीं आता शायद इसलिए इनके पुनर्वसन के लिए ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। लेकिन इनकी उदारता तो देखिये अपने ही देश में शरणार्थियो की तरह जीवन व्यतीत करने के बाद भी भारत में इनकी आस्था कंही से कमजोर नहीं हुई है दूसरी तरफ अलगाववादी हैं जिन्हें सरकार के तरफ से हर सुविधांए प्रदान की जाती है फिर भी वह भारत को अपना देश नहीं मानते और कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रचते रहते हैं इसके बाद भी वह कश्मीर में शान के साथ रहते है। कश्मीरी पंडितो को नाराजगी सिर्फ सरकार से नहीं है उनकी आंखे कुछ सवाल हमसे भी पूंछती हैं कि क्या हमें भी उनका दर्द नहीं दिखाई देता ? अगर दिखता है तो हम मौन क्यों हैं, इन सवालो का जवाब अपने अन्दर खोजना होगा की कश्मीरी पंडितो को हमारे सदभावना की नहीं हमारे प्रयासों की आवश्कता है ।

डल झील व गुलमर्ग के फूलो की खूबसूरती बिना कश्मीरी पंडितो के अधूरी है। कश्मीर फिर से सही मान्ये धरती का स्वर्ग तभी बन पाएगा जब कश्मीरी पंडितो की सुरक्षित घर वापसी हो जाएगी और घाटी एक बार फिर कश्मीरी पंडितो के मन्त्र उचारण से गुजने लगेगी.....

Wednesday, 6 October, 2010

अयोध्या विवाद सुलह के कगार पर पहुँच कर उलझता हुआ

देश के अखंडता व एकता से जुड़ा हुआ अब तक सबसे बड़ा फैसला अयोध्या विवाद पर ६० वर्ष के लम्बे अन्तराल के बाद आखिरकार इलाहबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच ने अपना फैसला सुना दिया। जब फैसला आया तो लगा मानो अब ये विवाद सुलज जायेगा क्योंकि फैसला था ही ऐसा जिसमे न तो किसी पक्ष कि हार हुई थी न ही किसी पक्ष कि जीत अदालत ने विवादित भूमि को तीनो पक्षों में बाट दिया दूसरे शब्दों कहे तो अदालत ने दोनों समुदायों के बिच सुलह के लिए मार्ग प्रस्तुत कर दिया।

अर्थात अदालत ने अपने फैसले से जंहा एक ओर करोडो हिदुओ की आस्था का ख्याल रखा वंही दूसरी तरफ मुस्लिमो के जख्मों को भी भरने का सफल प्रयास किया। अदालत के इस फैसले का दूसरा पक्ष भी है इस फैसले ने अयोध्या विवाद पर राजनीती करने वालो कि दुकान बंद कर दि तभी शायद उनको ये फैसला पचाने में मुस्किल हो रही है।

अब इस प्रकार के लोग जो नहीं चाहते है कि इस विवाद का कभी पूर्ण हल निकल सके इसीलिए व इसे फिर से अदालत में ले जाना चाहते है ।अगर ये विवाद पुनः अदालत में गया तो ये एक बार फिर राजनीती का अखाडा बन जाये गा । अब आवश्कता है दोनों पक्षों को बैठ कर इस विवाद को सुलझाने की यंहा दुष्यंत के कविता कि व लाइन ठीक प्रतीत होती है की

हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

अब बहुत हो गया अब इस विवाद का पूर्ण हल निकलना ही चाहिए हल भी एसा जो दोनों पक्षों को पूर्ण तह मनाये हो। हम सब आम भारतवासियों को चाहे व मुस्लिम हो या हिन्दू इन हुक्मरानों से गुजारिश करनी चाहिय कि अब बस इस मुद्दे को और राजनीती में न घसीटे मानिये उच्च न्यायलय ने जो सुलह का सुनेहरा अवसर प्रदान किया है उसका अनुसरण करते हुए इस विवाद का पूर्ण व स्थायी हल निकाले।

नहीं तो अयोध्या विवाद सुलह के कगार पर पहुँच कर उलझता चला जायेगा और हम यह सुनहेरा मोका गँवा देंगे।