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Tuesday, 5 July, 2011

अन्ना हजारे, सिविल सोसायटी व जनलोकपाल बिल पर एक नज़र




आज सम्पूर्ण भारत में एक बात राजनीति का का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है लोकपाल बिल, अन्ना हजारे देश की हीरो बन चुके है। लेकिन जिस प्रकार सिक्के दो पहलु होते हैं उसी प्रकार हमें सिर्फ अन्ना व उनकी टीम के एक पहलू को नहीं देखना चाहिए की सब अच्छा ही अच्छा है। निश्चित तौर अन्ना का आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण है लेकिन इसमें कई सवाल ऐसे जिनका उत्तर ढूढ़ा जाना चाहिए। आज हम और हमारा समाज भ्रष्ट्राचार के दलदल में धंसा हुआ है और अन्ना हजारे इससे तारनहार के रुप में उभर कर सामने आये हैं तो यह इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि इस आन्दोलन के अनछूये पहलुओं पर कुछ प्रकाश डाला जायें।
निम्नलिखित प्रश्नो के आधार पर अन्ना व उनकी टीम की समीक्षा करने का प्रयास किया जा सकता है।
1. क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम सिविल सोसायटी का चहेरा है ?
2. क्या अन्ना अनजाने में या जान बूझ कर सरकार की राह तो आसान नही कर रहे है इस आन्दोलन का भविष्य क्या है?
3. कभी अन्ना जनप्रतिनिधियों व राजनीतिक पार्टियों को अपनें आस-पास तक नहीं फटकने देते है तो कभी स्वंय ही उनके दरबार में पहुंच जाते है।
4. क्या देश के लोकतात्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है की अन्ना व उनकी टीम ही इसकी संजीवनी है?
5. अगर भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ आता है तो उसे सांप्रदायिकता व विचार के रंग में रंग कर क्यों देखा जाता है?

पहला सवाल अपने आप अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम ही सिविल सोसायटी है। अन्ना की टीम में अरविंद केजीरीवाल, किरण वेदी प्रशान्त भूषण व उनके पिता शांति भूषण प्रमुखता से दिखाई पड़ते है। क्या ये लोग 1 अरब आम जान का प्रतिनिधित्व करते है ये सोचने का विषय है। अभी भारत में ऐसी स्थिती नहीं आयी है कि कोई भी अपने आप को सिविल सोसायटी होने का दाबा कर सके। सिविल सोसायटी सम्पूर्ण समाज का प्रतिबिम्भ होता है समाज से जोड़े तमान वर्गो को मिला कर सिविल सोसायटी का स्वरुप तैयार होता है लेकिन अन्ना हजारे की सिविल सोसायटी में इसका अभाव दिखता है अन्ना व उनकी टीम किसी भी रुप मे सिविल सोसायटि तो नहीं कहा जा सकता है।

दूसरा सवाल है कि क्या अन्ना का आन्दोलन सरकार का राह आसान तो नहीं कर रहे है या कहे अनजाने में अन्ना व उसकी टीम सरकार के लिए सेप्टी बॉल का काम तो नहीं कर रही है। जब अन्ना जंतर-मंतर पर अनशन शरु किया था तो सम्पूर्ण देश अन्ना के पिछे चल पड़ा था लग रहा था कि फिर देश को 1974 का दौर देखने को मिलेगा, क्या बच्चे क्या बूढे सभी अन्ना के पिछे खड़े थे सरकार बुरी तरह डरी हुई थी लेकिन अचानक भ्रष्ट्राचार के खिलाफ यह आन्दोलन खत्म हो जाता है क्योंकि सरकार अन्ना की जन लोकपाल बिल की मांग को मान लेती है और अन्ना अपना अनशन तोड़ देते है। सभी अपनी जीत की खुशी मनाकर घर चले जाते है पर स्थिती ज्यों की त्यों बनी हुई है।
कहने का तात्पर्य है कि सिर्फ लोकपाल बिल को ही मुद्दा बनाकर यह आन्दोलन कब तक चल सकता था, जन लोकपाल बिल एक मांग तो हो सकती थी लेकिन मात्र एक मांग नहीं। अन्ना को कालेधन, भ्रष्ट्राचार को भी आन्दोलन के मुद्दो में प्रमुखता से शामिल करना चाहिए था।
अगर अन्ना ने ऐसा किया होता तो 4 जून की घटना पहले ही घट गई होती। सरकार के लिए ये बड़ा आसान था कि वह उनकी मात्र इस मांग को मानकर आम जन के गुस्से को शांत कर दे। अन्ना को जे.पी की तरह सत्ता परिर्वतन के साथ व्यवस्था परिर्वता की राह पर चलना चाहिए था।

तीसरा सवाल दिलचस्प है। जब अन्ना ने जंतर-मंतर अपना अनशन किया था तो उन्होने अपने मंच पर किसी भी राजनैतिक पार्टी या जनप्रतिनिधि जिसे जनता ने चुनकर कर भेजा है नहीं आने दिया उनके लिए सभी राजनैतिक पार्टियां अछूत हो गई थी।
लेकिन फिर क्या जरुत आन पड़ी की अन्ना व उसकी टीम को उन्हीं लोगो के पास मिलने व लोकपाल पर चर्चा करने जाने पड़ा। अब उन्हे कैसे लगा की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी कही कोई भूमिका होती है। ये बात अन्ना को पहले ही समझ लेना चाहिए था कि अन्ना जिस गांधी जी के अनुयायी है वह सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे।

आखिर क्या देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है कि मात्र अन्ना की सिविल सोयायटि ही इसकी संजीवनी है। क्या विपक्ष पूर्णत पंगु हो चुका है कि वह अपने दायित्व का पालन नहीं कर सकता है। व्यवस्था का जितना भयावह रुप अन्ना टीम ने दिखाने का प्रयास किया है उतनी बुरी स्थिती अभी नहीं आई है। अन्ना को चाहिए की वह संपूर्ण विपक्ष को साथ लेकर चले।
अन्ना व उनकी टीम भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ खड़े होने वाले को सांप्रदायिकती के तराजू में तौल कर क्यों देखती है। उनके लिए संघ विचारधारा या संघ से जुड़ा हुआ व्यक्ति अछूत हो जाता है। ये अन्ना की टीम की कौन सी मापदंड है कि जो राम देव को शर्तो के आधार पर मंच पर आने के लिए कहती है। इस प्रकार से अन्ना व उनकी टीम सरकार का ही हाथ मजबूत करने का काम कर रही है। अन्ना को चाहिए की वह समाज के सभी वर्गो व विचारों जो भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध है साथ लेकर चले ।
इन सब के अलावा भी अन्ना की टीम की आलोचना की गई चाहे व प्रशान्त भूषण व उनके पिता की सम्पति विवाद हो या दोनो पिता-पुत्र को शामिल किया जाना हो। सवालो के घेरे में अन्ना भी आये उनकी मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया गया।

यह सही है कि सशक्त जन लोकपाल भ्रष्ट्राचार पर लगाम लगाने में कारगर सिद्ध होगा लेकिन इसके लिए आवश्यकता मजबूत राजनैतिक इच्छा शक्ति की, समाज के तमान वर्गो को साथ में लेकर चलने की न की किसी को अछूत समझने की ।
इन सभी के बाद भी अन्ना हजारे का योगदान समाज के लिए अतुलनीय है। बस आवश्यकता है कि अन्ना की टीम समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चले ताकि भारत को भ्रष्ट्राचार के दलदल से बाहर निकाला जा सके व भविष्य में इस पर लगाम भी लगाया जा सके।
यह आलेख वीर अर्जुन,बढास4मिडिया,हस्तकक्षेप,प्रवक्ता पर प्रकाशित हो चुका है.....