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Wednesday 1 August 2012

असम एक चेतावनी



हाल के दिनों नार्थ ईस्ट एक बार फिर से राष्ट्रीय मिडिया के केन्द्र में है वैसे यदाकदा ही मिडिया का ध्यान इस ओर जाता है। भारत के उत्तर-पूर्व का राज्य असम अपने यहां हो रहे हिंसा के वजह से सुर्खियों में है। असम में जो आग जल रहीं वह महाविनाश के पहले की चेतावनी की तरह है कि अगर अभी भी हम नहीं सभलें तो एक दिन यह समस्या खुद बखुद हमारे देश से खत्म हो जायेगी क्योंकि जब असम ही हमारे मानचित्र से हट जायेगा तो असम से जुड़ी समस्या अपने आप ही खत्म हो जायेगी। असम के निचले जिले कोकराझाड़ से जो हिंसा शुरु हुई थी वह फैलकर पास के चिरांग और धुबड़ी जिले में पहुंच चुकी है। असम सरकार की माने तो यह जातीय हिंसा मुस्लिम बोडो जनजाति  के बीच चल रही है। लेकिन असलियत में यह संघर्ष असमी मुस्लिम के साथ नहीं अपितु बोडो जनजाति और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिये जो असम में अवैध रुप से रह रहे है उनके बीच चल रही है। 

ये बांग्लादेशी घुसपैठिये एक व्यापक साजिश के तहत धीरे-धीरे चरणबद्द तरीके से भारत के विभिन्न हिस्सो विशेष कर उत्तर-पूर्व में अपनी तादात बढाते जा रहे है। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि राजनीतिक ग्लियारे में इन्हें वोट बैंक के रुप देखा जाता है।  इसके बारे केन्द्र सरकार व राज्य सरकार दोनों ही भलिभाति अवगत है लेकिन वोट बैंक व तुष्टीकरण के राजनीति के कारण वह हमेशा से इस पर परदा डालते आ रहे है लेकिन हालिय संर्घष ने असम में चल रही व्यपाक साजिश का चहेरा सभी के सामने लाकर रख दिया है।

दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठिए बड़े पैमाने पर असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, नागालैंड, दिल्ली और जम्मू कश्मीर तक लगातार फैलते जा रहे हैं। जिनके कारण जनसंख्या असंतुलन बढ़ा है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों का इस्तेमाल आतंक की बेल के रूप में हो रहा है, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ और कट्टरपंथियों के निर्देश पर बड़े पैमाने पर हुई बांग्लादेशी घुसपैठ का लक्ष्य ग्रेटर बांग्लादेश का निर्माण करना है साथ भारत के अन्य हिस्सों में आतंकी घटनाओ को अंजाम देने के लिए भी इनका प्रयोग किया जा रहा है जिसके लिए भारत के सामाजिक ढांचे का नुकसान व आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल हो रहा है। दैनिक जागरण में छपे खबर के अनुसार सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीआइजी बरोदा शरण शर्मा इन घुसपैठियों को आने वाले समय की बड़ी समस्या मानते हैं। शर्मा सेवाकाल में लंबे समय तक बांग्लादेश सीमा पर तैनात रह चुके हैं।

असम में जनंसख्या जिस अनुपात से बढ रही वह स्थिती कितनी भयावह इसको दर्शाती है। असम में 1971-1991 में हिन्दुओ की जनसंख्या बढोतीर का अनुपात 42.89 है जबकि मुस्लिम जनंसख्या में इससे 35% अधिक 77.42% की दर से बढोतरी हुई, इसके विपरित सर्पूण भारत में दोनो के बीच में अंतर 19.79% का रहा। 1991-2001 में हिन्दु जनसंख्या बढोतरी दर 14.95% रही जबकि मुस्लिम जनंसख्या में यहां भी 14.35% अधिक, 29.3% की दर से बढोतरी हुई। 1991 में असम में मुस्लिम जनसंख्या  28.42%  थी जो 2001 के जनगणना के अनुसार बढ कर 30.92%प्रतिशत हो गई, 2011 जनगणना में स्थिती और भी भयावह हो सकती है। (विकीपिडिया, आर्थिक सर्वेक्षण 2011-2012 असम,)

हिन्दुस्तान सरकार के बोर्डर मैनेजमेण्ट टास्क फोर्स की वर्ष कि 2000 रिपोर्ट के अनुसार 1.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार हिन्दुस्तान में बांग्लादेशी मुसलमानों घुसपैठीयों की संख्या इस प्रकार है : पश्चिम बंगाल 54 लाख, असम 40 लाख, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि में 5-5 लाख से ज्यादा दिल्ली में 3 लाख हैं; मगर वर्त्तमान आकलनों के अनुसार हिन्दुस्तान में करीब 3 करोड़ बांग्लादेशी मुसलमानों घुसपैठिए हैं जिसमें से 50 लाख असम में हो सकते है।

असम में जिन तीन जिलों में यह संघर्ष चल रहा है तो अगर उन जिलो के जनगणना विशलेषण पर एक नंजर डाले तो स्थिती अपने आप ही साफ हो जाती है। सबसे पहले कोकड़ाझाड जिले पर नंजर डाले 2001-2011 में यहां जनसंख्या मे वृद्धि दर 5.19% रही और 2001 के जनगणना के अनुसार इस जिले में  मुस्लिमों की संख्या बढकर लगभग 20% हो गई है। अगर हम असम मुस्लिम जनंसख्या में वृद्धि दर को देखे तो बंग्लादेश से सटे जिलो में यह सबसे अधिक है जिसके पिछे बंग्लादेशी घुसपैठ मुख्य कारण है। धुबड़ी जिला भी बंग्लादेश के सीमा से सटा हुआ है। 1971 में यहां मुस्लिम जनसंख्या 64.46% थी जो 1991 में बढकर 70.45% हो गई, 2001 के जनगणना के अनुसार बढकर लगभग 75% हो गई। कमोबेश यही हाल 2004 में बने चिरांग जिले का भी है।
जनसंख्या के बढोतरी का अनुपात देखकर यह साफ प्रतीत होता है कि यह जनसंख्या में सहज हुई वृद्दी नहीं है अपितु यह बंग्लादेश से आये घुसपैठियों  का नतींजा है।

असम इन देश द्रोही तत्वो के लिए के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योकिं अगर किसी प्रकार से असम पर ये अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेते है बाकि उत्तर-पर्व के राज्यों को भारत से अलग किया जा सकता है, असम ही जो उत्तर-पर्व को शेष भारत से जोड़ता है। यहां जरुत है कि हम इस मुद्दो को वोट बैंक के लिए घर्म का चादर न उढाये। यहां विरोध मुस्लमानो से नहीं है लेकिन वोट बैंक की राजनीती के चलते जब भी इस ओर कोई आवाज उठायी जाती है इसे सांप्रदायिकता के रंग में रंग दिया जाता है। बांग्लादेशी घुसपैठ मुस्लमानों के लिए ज्यादा नुकसान देह है इनसे जो जनसंख्या में भारी असंतुलन हो रहा है उससे  बेरोजगारी की समस्या उत्पन हो रही है इसके अलावा  जो सुविधायें हमारी सरकार हमारे अपल्संख्यों को देती है वह उसमें में भी वह धीरे- धीरे हिस्सेदार बनते जा रहे है।  

बागंलादेश घुसपैठ हमारी आंतरीक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रुप में सामने आये है। यहां जरुत है दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति की ताकि हम वोट बैंक की राजनीती व धर्म के दायरे से बाहर आकर  देश की सुरक्षा के लिए जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान ढूंढे क्योकि अगर हम अभी चूक जाते है तो शायद फिर बहुत देर हो जायेगी।

Monday 11 June 2012

वंशवाद बनाम जनतंत्र


आज हम हमारी संसद के 60 वर्ष पूर्ण होने का जश्न मना रहे है, भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव हासिल है। जहां आजादी के बाद हमारे पड़ोसी देशो में निरंकुश व सैन्य शक्ति के सामने लोकतंत्र ने दम तोड़ दिया वहीं भारत में प्रतिकुल परिस्थितयों में भी लोकतंत्र ने अपनी मजबूती बनाये रखी। जैसे-जैसे हम आगे बढते गये हमारा लोकतंत्र भी मजबूत होता गया। इतनी विषमताओं के बावजूद भी मारत में लोकतांत्रिक प्रणाली निशपक्ष है इसमें सभी वर्गो व समाज की भागीदारी है। भारती लोकतंत्र की मजबूती का लोहा आज संपूर्ण विश्व मानता है लेकिन जिस प्रकार सिक्के दो पहलू होते है उसी प्रकार सफलता के दो पहलू होते है सकारात्मक व नकारात्मक और सफलता को सुदृढ बनाने के लियें ये आवश्यक है कि हम अपने नकारात्मक पहलुओं की खुली चर्चा करके इसके समाधान का उपाये करें यहीं जनतंत्र की विशेषता भी है।

जैसे जैसे देश में लोकतंत्र मजबूत होता गया वैसे वैसे वंशवाद ने भी अपने जड़े मजबूती से जमा ली। जब देश में क्षेत्रीय व जाति आधारित पार्टियों का वर्चस्व बढा तो इसने वंशवाद के वेल को और मजबूती प्रदान की। कांग्रेश देश की सबसे पुरानी राजनैतिक दल है आजादी से पूर्व इस दल पर किसी परिवार विशेष का एकाधिकार नहीं था। इसके पहले अध्यक्ष वोमेश चंद्र बैनर्जी से लेकर बाद के कई नेता चाहे वह दादा भाई नौरोजी हो या सुभाष चन्द्र बोस हो सभी अलग- अलग पृष्ठ भूमि से आते थे। आजादी के बाद नेहरु देश के पहले प्रधांनमंत्री बने और तब से लेकर अब तक कांग्रेस पर गांधी परिवार का ही एकतरफा वर्चस्व रहा है। वर्तमान में भी प्रधानमंत्री बेसक माननीय मनमोहन सिंह जी हो लेकिन यह जग जाहिर है कि सत्ता वास्तव में कहां से चलती है पार्टि में अंतिम निर्णय किसका होता है।  क्षेत्रीय व जातिय आधारित दलो ने वंशवाद के इस विषैले पौधे के लिए के लिए अमृत का काम किया। लोहिया ने भारत में  समाजवाद के धारा का प्रवाह किया वह जाति व वंशावली आधारित राजनीति को भारत से हटाने चाहते है थे लेकिन उनके दुनिया से जाने के बाद उनके ही समर्थको ने उलटी गंगा बहानी शुरु कर दी। हाल में ही यूपी का चुनाव संपन हुआ है और समाजवादी पार्टी ने अखिलेश के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत हासिल किया है।  अखिलेश को सत्ता की विरासत उऩके पिता मुलायम सिंह यादव से  मिली है ये हो सकता है कि अखिलेश अच्छे नेता साबित हों लेकिन क्या पार्टी में और कोई योग्य नेता नहीं था जिस को कमान सौपी जा सकती थी। महाराष्ट्र में भी एक वक्त था जब राज ठाकरे में बाला साहेब ठाकरे की परिछांई दिखती थी लेकिन जब पार्टि का कमान सौपने के बारी आई तो बाला साहेब  ने अपने खून पर ज्यादा विश्वास दिखाया और उद्वव को पार्टि का कमान सौंप दिया। तमिलांडु में करुना नीधि ने का परिवार सभी प्रमुख पदों पर काबिज था । यही हाल लगभग सभी दलो का है।

पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को उपमुख्यमंत्री पद व पार्टि अध्यक्ष के लिए अपने बेटे सुखवीर सिंह बादल से योग्य व्यक्ति नहीं मिला।  उड़ीसा में बीजु पटनायक को अपने पुत्र नवीन पटनायक में ही नेतृत्व के सारी क्षमता ऩजर आयी तो जन्मू-कश्मीर में फारुक अब्दुला को उमर अब्दुला ही सियासी दावं पेच में सबसे अवल ऩजर आये। कमोबेश यही हाल लगभग सभी पार्टियो का है इनको अपने खून व अपने सगे संबंधियो में सभी खूबिया ऩजर आती है जिसका दामन देखो वही दागदार ऩजर आता है।  अपवदा के रुप में दक्षिणापंथ की भारतीय जनता पार्टि व वामंपथ की पार्टियां है जो कुछ हद तक इनसे दूर है।  लेकिन इन दलों में भी वंशवाद ने अपने जड़ो को फैलाना शरु कर दिया है। हांलाकि यहां राजनेताओ के पुत्र, सगे संबंधियों का राजनीति में आने का कोई विरोध नहीं है बशर्ते यह योग्यता के आधार पर हो न कि व्यवसायिक वंश परंपरा पर आधारित हो। अगर वंशवाद का दंश इसी प्रकार फैलता रहा तो यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दूषित व विषैला बना देगा। सफल जनंतत्र का मूल मंत्र ही यही है कि इसमें सभी को योग्यता के आधार पर आगे आने का मौका मिलना चाहिए। अगर वंशवाद के इस बेल अभी बढ़ने से नहीं रोका गया तो भारत पर कुछ परिवार विशेष का अधिकार हो जायेगा।

वंशवाद को जड़ से उखार फैकने के लिए दृढ राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ जरुत है समाज को जागरुक होने की। यहां जितनी जिम्मेदारी राजनैतिक दलो की है उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदारी हमारी बनती है कि हम किस प्रकार दृढ इच्छा शक्ति के साथ भारत को  वंशवाद के इस जाल से मुक्त कराते है। आखिरकार लोकतंत्र जनता का, जनता पर, जनता के द्वारा किया गया शासन है। अगर हम दृढ निश्चच कर ले कि हम जाति, धर्म व क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर अपने नेता का चुनाव करेगें तो कोई भी राजनैतिक दल चाह कर भी हमारे ऊपर इस विषैले वंशवाद को नहीं थोप सकता है। 

Friday 4 May 2012

मंगलेश डबराल जी को खुला पत्र


आदरणीय मंगलेश डबराल जी,
मंगलेश डबराल जी  किसी कार्यक्रम में जाना या नहीं जाना यह अपका अपना फैसला है। आप भारत नीति प्रतिष्ठान के कार्यक्रम समान्तर सिनेमा, के गोष्ठी में अध्यक्ष के नाते आये थे। मैं भी श्रोताओं में था और कार्यक्रम के आयोजन से भी जुड़ा हुआ था। आपने जिस प्रकार से माफीनामा दिया और कार्यक्रम में भाग लेने को एक चुक बाताया उसे देखकर मुझे आश्चर्य एंव दुख दोनो हुआ। आपने कुछ ऐसी बाते कहीं जो तथ्यो से परे है।
1.       आपको  मैने ही प्रतिष्ठान का साहित्य भेट किया आपने उसे सहर्ष स्वीकार किया साथ ही आपने प्रतिष्ठान के कार्यो के प्रशंसा भी की ।
2.       आपने अपने उदबोधन में निदेशक का नाम बड़े सम्मान से लिया।
3.       प्रतिष्ठान द्वारा इस आयोजन की भी सराहना की ।
4.       विषय पर खुली चर्चा हुई।
कार्यक्रम के दौरान क्या आपको कही लगा की आप किसी प्रकार के दवाब में बोल रहे है? इसके बावजूद आपने प्रतिष्ठान को  व्यवसायिक संस्था नहीं है जो प्रमाण पत्र दिया वह आपकी integrity पर सवाल खड़ा करता है। आप अपने बंधुओ से सीधे माफ़ी मांग लेते तो कोई हर्ज नहीं था परंतु माफ़ी मांगने के क्रम मे आपने जो तर्क दिया वह आप जैसे श्रेष्ठ विद्वान के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है। कार्यक्रम में आपका अभिनंदन हुआ, आपका परिचय दिया गया जिसमे आपके योगदान एवं व्यकित्तव की चर्चा की गई कार्यक्रम से पहले निदेशक के कमरे में अनेक लोगो के साथ आपने खुली चर्चा की इस दौरान क्या आपको लगा की आप पर विचारधारा थोपी जा रही है? आप कार्यक्रम के दौरान व बाद में भी पूर्ण संतुष्ट ऩजर आ रहे थे। कार्यक्रम के उपरान्त आपने श्रोताओं के साथ खुली चर्चा भी की। आपने स्वंय सार्वजनिक रुप से कहा था कि आप प्रतिष्ठान को आपके द्वारा संपादित दि पब्लिक एजेंडा की मेलिंग सूची में शामिल करेगें साथ आपने इसकी प्रति भी संस्थान के मानद निदेशक प़्रो राकेश सिन्हा जी को दी थी। जब मैं आप को नीचे आपकी गाड़ी तक छोड़ने गया था इस दौरान भी आपने कार्यक्रम को सार्थक बताया था। कार्यक्रम में भाग लेने के उपरांत मुझे जो प्रतीत होता है कि  प्रतिष्ठान ने तो शुद्ध शैक्षणिक व व्यवसायिक द़ष्टि में चर्चा का आयोजन किया था किंतु आपने ट्रेड यूनियन के दवाब में अपने विवेक समर्पण कर दिया जो आप जैसे महान साहित्कार को शोभा नहीं देता है।
नवनीत
यह पत्र जनसत्ता और महौला लाईव में भी प्रकाशित हो चुका है


Thursday 5 April 2012

क्यों हाशिए पर हैं प्रगतिशील मुस्लिम विचारक ?

क्या धर्मनिरपेक्षता कट्टरपंथियों की बलि चढ़ जाएगी ? इसी सवाल को गंभीरता से उठाता हुआ यह आलेख भारत नीति प्रतिष्ठान की पाक्षिक उर्दू मीडिया समीक्षा न्यूजलेटर में प्रो० राकेश सिन्हा की सम्पादकीय से साभार प्रकाशित किया जा रहा है |

ढ़ाई दशक पहले एक असहाय महिला ने अपने अस्तित्व बचाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। पति से तलाक मिलने के बाद उसे जो ‘मेहर’ दिया गया था वह इंदौर से दिल्ली तक का किराया भी नहीं होता। नीचे से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उसके हक, सम्मान और अपेक्षाओं को मानवीय, नैतिक एवं संवैधानिक दृष्टि से उचित माना था। शाहबानो के इस केस ने भारतीय राजनीति एवं सामाजिक जीवन में भूचाल खड़ा कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने न्यायालय के फैसले को मुस्लिम पर्सनल लाॅ के मामले में हस्तक्षेप करार दिया और भारत की ‘सेकुलर’ सरकार ने उनके सामने घूटना टेक दिया। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व में वर्णित और अपेक्षित समान कानून संहिता ;Uniform Civil Code उसी दिन निष्प्रभावी एवं Dead Letter बना दिया गया। तुर्की ही नहीं दो दर्जन से अधिक इस्लामिक देशों ने ‘पर्सनल लाॅ’ को आधुनिकता, वैज्ञानिकता एवं परिस्थितियों के संदर्भ में फेर-बदल किया है। परंतु भारत में यह स्वीकार्य नहीं है। आचार्य जे.बी. कृपलानी ने हिंदू कोड बिल पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा था कि भारतीय राज्य भी सांप्रदायिक संगठनों की तरह व्यवहार कर रही है। यह एक समुदाय के लिए तो कानून में सुधार एवं संशोधन तो कर रही है। दूसरों को छोड़ रही है। इतिहास ने कृपलानी के इस कथन को यथार्थ बना दिया है। 2012 में महाराष्ट्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा एक विधेयक तैयार किया गया है। इसमें महिलाओं को आर्थिक रूप से पारिवारिक एवं सामाजिक स्तरों पर सबल बनाने का प्रयास किया गया है। उन्हें पति की संपत्ति में आधा हिस्सा का अधिकार दिया गया। इस विधेयक के अनुसार किसी वैवाहिक संपत्ति के क्रय-विक्रय में पत्नी की सहमति आवश्यक माना गया है। तलाक या बंटवारे की स्थिति में पत्नी को आधी संपत्ति पर हक देने की बात विधेयक में है।अभी विधेयक पर विचार-विमर्श होना था। परंतु ‘अल्पसंख्यक वीटो’ ने इसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया। लिहाजा विरोध उलेमाओं या कट्टरपंथियों से शुरू नहीं हुआ। राज्य के अल्पसंख्यक विभाग ने प्रस्तावित कानून का विरोध किया। तर्क था कि यह मुस्लिमों की संवेदनाओं को चोट पहुंचाएगा। अल्पसंख्यक विकास मंत्री नसीम खान ने विरोध की अगुआई की और राज्य सरकार ने घुटना टेक दिया। खान ने शरीयत के अतिरिक्त उसको पुष्ट करने वाले दो कानूनों Dissolution of Muslim Marriage Act 1939 और Muslim Women (Protection of Right on Divorce) Act 1986 का हवाला दिया। क्या भारतीय गणतंत्र, न्याय व्यवस्था और नारियों का अधिकार कट्टरपंथियों के मुताबिक परिभाषित होता रहेगा? यह राज्य पोषित सांप्रदायिकता नहीं तो और क्या है?एक दूसरी अहम घटना भी भारतीय गणतंत्र के लिए अमंगलकारी संकेत दे रहा है। पूरा विश्व एक नए प्रकार के खतरे के कारण अनिश्चितता में जी रहा है। यह है आतंकवाद का बढ़ता मंसूबा। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, आस्ट्रेलिया, बेल्जियमय और ब्रिटेन अपने-अपने तरीकों से इस संभावित खतरे से बचने के लिए बेफिक्र होकर कदम उठा रहे हैं। आतंरिक सुरक्षा को इन देशों में राजनीति का मोहरा नहंी बनने दिया गया है। न ही राज्य की नीतियों एवं सामाजिक दृष्टियों में कोई बड़ी खाई है। बेल्जियम का उदाहरण देखिए। आंतरिक सुरक्षा को देखते हुए जब वहां के सिनेट में बुर्का पर प्रतिबंध का विधेयक लाया गया तो 134 में 134 सदस्यों ने प्रतिबंध के समर्थन में मत दिया। सिर्फ दो सदस्य व्यक्तिगत कारणों से अनुपस्थित थे। भारत इन देशों का अनुकरण करे यह जरूरी नहीं है। परंतु आंतरिक सुरक्षा की अहमियत को तो कम से कम इससे समझा जा सकता है। जिस प्रकार आतंकवाद एवं आंतरिक सुरक्षा के प्रश्नों के साथ देश में निम्न स्तर की राजनीति हो रही है वह चिंता का विषय है। 13 फरवरी को इजराईल के एक कुटनीतिक के कार पर बम से हमला हुआ। सुराग मिलने पर 7 मार्च 2012 एक पत्रकार काजमी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने मीडिया के सामने भी कई तथ्यों को उजागर किया। परंतु बुद्धिजीवियों के एक वर्ग एवं उर्दू मीडिया ने उसकी गिरफ्तारी को मुस्लिम अस्मिता एवं अस्तित्व से जोड़ दिया। दिल्ली से देवबंद तक छोटी-बड़ी जगहों पर उसे ‘नायक’ की तरह प्रस्तुत कर उसे मुक्त किए जाने के लिए धरना, प्रदर्शन संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। गांव और कस्बों के मुसलमानों को किस प्रकार जगाया जा रहा है उसे दिल्ली से प्रकाश्ति ‘सहाफत’ के इस शीर्षक से जाना जा सकता है-”हिंदुस्तान में मुसलमान होना ही जुर्म हो गया है। काजमी का नाम अगर राम-कृष्ण होता तो उसके साथ यह सलूक नहीं होता।“ एक सामाजिक कार्यकर्ता जो ‘अनहद’ से जुड़ी है शबनम हासमी ने इसे राज्य का मुसलमानों पर कहर बताते हुए कहा कि ”पहले मौलवी फिर नौजवान और अब वरिष्ठ पत्रकारों पर निशाना।“ उर्दू अखबारों ने जो अभियान चलाया उसे देखिए। एक-एक दिन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए गए हैं। हिंदुस्तान एक्सप्रेस और हमारा समाज ने 12 मार्च के अंक में काजमी के समर्थन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए। हमारा समाज ने दो-दिन बाद फिर पांच समाचार प्रकाशित किया तो इंकलाब ने उसी दिन छह समाचार प्रकाशित किया। रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने 14 मार्च को पांच समाचार छापा है। उर्दू टाइम्स ने तो लिख दिया कि ”इजराईल के खिलाफ नहीं लिखना वरना गिरफ्तार हो जाओगे।“ दिल्ली और देवबंद के कुलीनों के जिनमें अनेक प्रबुद्ध एवं जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं के इस अभियान का आम मुसलमानों के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या यह कार्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की एक साजिश तो नहीं है?इसका दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के प्रश्नों पर राज्य एवं जांच एजेंसियां सांप्रदायिक ताकतों के दबाव में काम करेगी? दुर्भाग्य से मानवाधिकार से जुड़े कुछ संगठनों एवं लोगों ने इस अभियान को ताकत एवं वैधानिकता देने का काम किया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार आंतरिक सुरक्षा का इतने बड़े पैमाने पर सांप्रदायिकरण कर उसे समुदाय-चेतना को मजबूत करने का औजार बनाया गया है। अल्पसंख्यकवाद एक मगरमच्छ की तरह है जो कभी संतुष्ट नहंीं होता तभी संविधान सभा के उपाध्यक्ष डा. एच.सी. मुखर्जी (जो स्वयं आस्था से ईसाई मतावलंबी थे) ने संविधान सभा में चेताया था कि यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो किसी समुदाय को धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक नहीं मान सकते हैं। शाहबानों प्रकरण के ढ़ाई दशक बाद प्रगतिशील चिंतक-विचारक नेता आरिफ मोहम्मद खान ही नहीं तमाम प्रगतिशील मुस्लिम विचारकों चाहे ए.ए.ए. फैजी हों या मोइन शकीर या जस्टिस एम.एच. बेग की सोच-समझ हासिये पर हैं। ऐसा क्यों हुआ यह प्रश्न विचारणीय है। इस अंक में इन दो मुद्दों पर उर्दू अखबारों के समाचारों एवं लेखों का संक्षिप्त रूप विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है। एक सवाल हमारे सामने है क्या धर्मनिरपेक्षता कट्टरपंथियों की बलि चढ़ जाएगी?

(प्रो० सिन्हा भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक हैं | )