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Wednesday, 23 October 2013
सांप्रदायिक एवं निर्देशित हिंसा प्रतिरोध विधेयक,2011 (‘Prevention of Communal and Targeted Violence Bill, 2011’) स्वयं ही सांप्रदायिक है
Saturday, 31 August 2013
जन- आन्दोलन की बदलती परिभाषा
Wednesday, 1 August 2012
असम एक चेतावनी
Monday, 11 June 2012
वंशवाद बनाम जनतंत्र
Friday, 4 May 2012
मंगलेश डबराल जी को खुला पत्र
यह पत्र जनसत्ता और महौला लाईव में भी प्रकाशित हो चुका है
Thursday, 5 April 2012
क्यों हाशिए पर हैं प्रगतिशील मुस्लिम विचारक ?
ढ़ाई दशक पहले एक असहाय महिला ने अपने अस्तित्व बचाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। पति से तलाक मिलने के बाद उसे जो ‘मेहर’ दिया गया था वह इंदौर से दिल्ली तक का किराया भी नहीं होता। नीचे से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उसके हक, सम्मान और अपेक्षाओं को मानवीय, नैतिक एवं संवैधानिक दृष्टि से उचित माना था। शाहबानो के इस केस ने भारतीय राजनीति एवं सामाजिक जीवन में भूचाल खड़ा कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने न्यायालय के फैसले को मुस्लिम पर्सनल लाॅ के मामले में हस्तक्षेप करार दिया और भारत की ‘सेकुलर’ सरकार ने उनके सामने घूटना टेक दिया। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व में वर्णित और अपेक्षित समान कानून संहिता ;Uniform Civil Code उसी दिन निष्प्रभावी एवं Dead Letter बना दिया गया। तुर्की ही नहीं दो दर्जन से अधिक इस्लामिक देशों ने ‘पर्सनल लाॅ’ को आधुनिकता, वैज्ञानिकता एवं परिस्थितियों के संदर्भ में फेर-बदल किया है। परंतु भारत में यह स्वीकार्य नहीं है। आचार्य जे.बी. कृपलानी ने हिंदू कोड बिल पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा था कि भारतीय राज्य भी सांप्रदायिक संगठनों की तरह व्यवहार कर रही है। यह एक समुदाय के लिए तो कानून में सुधार एवं संशोधन तो कर रही है। दूसरों को छोड़ रही है। इतिहास ने कृपलानी के इस कथन को यथार्थ बना दिया है। 2012 में महाराष्ट्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा एक विधेयक तैयार किया गया है। इसमें महिलाओं को आर्थिक रूप से पारिवारिक एवं सामाजिक स्तरों पर सबल बनाने का प्रयास किया गया है। उन्हें पति की संपत्ति में आधा हिस्सा का अधिकार दिया गया। इस विधेयक के अनुसार किसी वैवाहिक संपत्ति के क्रय-विक्रय में पत्नी की सहमति आवश्यक माना गया है। तलाक या बंटवारे की स्थिति में पत्नी को आधी संपत्ति पर हक देने की बात विधेयक में है।अभी विधेयक पर विचार-विमर्श होना था। परंतु ‘अल्पसंख्यक वीटो’ ने इसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया। लिहाजा विरोध उलेमाओं या कट्टरपंथियों से शुरू नहीं हुआ। राज्य के अल्पसंख्यक विभाग ने प्रस्तावित कानून का विरोध किया। तर्क था कि यह मुस्लिमों की संवेदनाओं को चोट पहुंचाएगा। अल्पसंख्यक विकास मंत्री नसीम खान ने विरोध की अगुआई की और राज्य सरकार ने घुटना टेक दिया। खान ने शरीयत के अतिरिक्त उसको पुष्ट करने वाले दो कानूनों Dissolution of Muslim Marriage Act 1939 और Muslim Women (Protection of Right on Divorce) Act 1986 का हवाला दिया। क्या भारतीय गणतंत्र, न्याय व्यवस्था और नारियों का अधिकार कट्टरपंथियों के मुताबिक परिभाषित होता रहेगा? यह राज्य पोषित सांप्रदायिकता नहीं तो और क्या है?एक दूसरी अहम घटना भी भारतीय गणतंत्र के लिए अमंगलकारी संकेत दे रहा है। पूरा विश्व एक नए प्रकार के खतरे के कारण अनिश्चितता में जी रहा है। यह है आतंकवाद का बढ़ता मंसूबा। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, आस्ट्रेलिया, बेल्जियमय और ब्रिटेन अपने-अपने तरीकों से इस संभावित खतरे से बचने के लिए बेफिक्र होकर कदम उठा रहे हैं। आतंरिक सुरक्षा को इन देशों में राजनीति का मोहरा नहंी बनने दिया गया है। न ही राज्य की नीतियों एवं सामाजिक दृष्टियों में कोई बड़ी खाई है। बेल्जियम का उदाहरण देखिए। आंतरिक सुरक्षा को देखते हुए जब वहां के सिनेट में बुर्का पर प्रतिबंध का विधेयक लाया गया तो 134 में 134 सदस्यों ने प्रतिबंध के समर्थन में मत दिया। सिर्फ दो सदस्य व्यक्तिगत कारणों से अनुपस्थित थे। भारत इन देशों का अनुकरण करे यह जरूरी नहीं है। परंतु आंतरिक सुरक्षा की अहमियत को तो कम से कम इससे समझा जा सकता है। जिस प्रकार आतंकवाद एवं आंतरिक सुरक्षा के प्रश्नों के साथ देश में निम्न स्तर की राजनीति हो रही है वह चिंता का विषय है। 13 फरवरी को इजराईल के एक कुटनीतिक के कार पर बम से हमला हुआ। सुराग मिलने पर 7 मार्च 2012 एक पत्रकार काजमी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने मीडिया के सामने भी कई तथ्यों को उजागर किया। परंतु बुद्धिजीवियों के एक वर्ग एवं उर्दू मीडिया ने उसकी गिरफ्तारी को मुस्लिम अस्मिता एवं अस्तित्व से जोड़ दिया। दिल्ली से देवबंद तक छोटी-बड़ी जगहों पर उसे ‘नायक’ की तरह प्रस्तुत कर उसे मुक्त किए जाने के लिए धरना, प्रदर्शन संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। गांव और कस्बों के मुसलमानों को किस प्रकार जगाया जा रहा है उसे दिल्ली से प्रकाश्ति ‘सहाफत’ के इस शीर्षक से जाना जा सकता है-”हिंदुस्तान में मुसलमान होना ही जुर्म हो गया है। काजमी का नाम अगर राम-कृष्ण होता तो उसके साथ यह सलूक नहीं होता।“ एक सामाजिक कार्यकर्ता जो ‘अनहद’ से जुड़ी है शबनम हासमी ने इसे राज्य का मुसलमानों पर कहर बताते हुए कहा कि ”पहले मौलवी फिर नौजवान और अब वरिष्ठ पत्रकारों पर निशाना।“ उर्दू अखबारों ने जो अभियान चलाया उसे देखिए। एक-एक दिन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए गए हैं। हिंदुस्तान एक्सप्रेस और हमारा समाज ने 12 मार्च के अंक में काजमी के समर्थन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए। हमारा समाज ने दो-दिन बाद फिर पांच समाचार प्रकाशित किया तो इंकलाब ने उसी दिन छह समाचार प्रकाशित किया। रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने 14 मार्च को पांच समाचार छापा है। उर्दू टाइम्स ने तो लिख दिया कि ”इजराईल के खिलाफ नहीं लिखना वरना गिरफ्तार हो जाओगे।“ दिल्ली और देवबंद के कुलीनों के जिनमें अनेक प्रबुद्ध एवं जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं के इस अभियान का आम मुसलमानों के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या यह कार्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की एक साजिश तो नहीं है?इसका दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के प्रश्नों पर राज्य एवं जांच एजेंसियां सांप्रदायिक ताकतों के दबाव में काम करेगी? दुर्भाग्य से मानवाधिकार से जुड़े कुछ संगठनों एवं लोगों ने इस अभियान को ताकत एवं वैधानिकता देने का काम किया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार आंतरिक सुरक्षा का इतने बड़े पैमाने पर सांप्रदायिकरण कर उसे समुदाय-चेतना को मजबूत करने का औजार बनाया गया है। अल्पसंख्यकवाद एक मगरमच्छ की तरह है जो कभी संतुष्ट नहंीं होता तभी संविधान सभा के उपाध्यक्ष डा. एच.सी. मुखर्जी (जो स्वयं आस्था से ईसाई मतावलंबी थे) ने संविधान सभा में चेताया था कि यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो किसी समुदाय को धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक नहीं मान सकते हैं। शाहबानों प्रकरण के ढ़ाई दशक बाद प्रगतिशील चिंतक-विचारक नेता आरिफ मोहम्मद खान ही नहीं तमाम प्रगतिशील मुस्लिम विचारकों चाहे ए.ए.ए. फैजी हों या मोइन शकीर या जस्टिस एम.एच. बेग की सोच-समझ हासिये पर हैं। ऐसा क्यों हुआ यह प्रश्न विचारणीय है। इस अंक में इन दो मुद्दों पर उर्दू अखबारों के समाचारों एवं लेखों का संक्षिप्त रूप विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है। एक सवाल हमारे सामने है क्या धर्मनिरपेक्षता कट्टरपंथियों की बलि चढ़ जाएगी?
(प्रो० सिन्हा भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक हैं | )
Tuesday, 5 July 2011
अन्ना हजारे, सिविल सोसायटी व जनलोकपाल बिल पर एक नज़र

आज सम्पूर्ण भारत में एक बात राजनीति का का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है लोकपाल बिल, अन्ना हजारे देश की हीरो बन चुके है। लेकिन जिस प्रकार सिक्के दो पहलु होते हैं उसी प्रकार हमें सिर्फ अन्ना व उनकी टीम के एक पहलू को नहीं देखना चाहिए की सब अच्छा ही अच्छा है। निश्चित तौर अन्ना का आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण है लेकिन इसमें कई सवाल ऐसे जिनका उत्तर ढूढ़ा जाना चाहिए। आज हम और हमारा समाज भ्रष्ट्राचार के दलदल में धंसा हुआ है और अन्ना हजारे इससे तारनहार के रुप में उभर कर सामने आये हैं तो यह इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि इस आन्दोलन के अनछूये पहलुओं पर कुछ प्रकाश डाला जायें।
निम्नलिखित प्रश्नो के आधार पर अन्ना व उनकी टीम की समीक्षा करने का प्रयास किया जा सकता है।
1. क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम सिविल सोसायटी का चहेरा है ?
2. क्या अन्ना अनजाने में या जान बूझ कर सरकार की राह तो आसान नही कर रहे है इस आन्दोलन का भविष्य क्या है?
3. कभी अन्ना जनप्रतिनिधियों व राजनीतिक पार्टियों को अपनें आस-पास तक नहीं फटकने देते है तो कभी स्वंय ही उनके दरबार में पहुंच जाते है।
4. क्या देश के लोकतात्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है की अन्ना व उनकी टीम ही इसकी संजीवनी है?
5. अगर भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ आता है तो उसे सांप्रदायिकता व विचार के रंग में रंग कर क्यों देखा जाता है?
पहला सवाल अपने आप अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम ही सिविल सोसायटी है। अन्ना की टीम में अरविंद केजीरीवाल, किरण वेदी प्रशान्त भूषण व उनके पिता शांति भूषण प्रमुखता से दिखाई पड़ते है। क्या ये लोग 1 अरब आम जान का प्रतिनिधित्व करते है ये सोचने का विषय है। अभी भारत में ऐसी स्थिती नहीं आयी है कि कोई भी अपने आप को सिविल सोसायटी होने का दाबा कर सके। सिविल सोसायटी सम्पूर्ण समाज का प्रतिबिम्भ होता है समाज से जोड़े तमान वर्गो को मिला कर सिविल सोसायटी का स्वरुप तैयार होता है लेकिन अन्ना हजारे की सिविल सोसायटी में इसका अभाव दिखता है अन्ना व उनकी टीम किसी भी रुप मे सिविल सोसायटि तो नहीं कहा जा सकता है।
दूसरा सवाल है कि क्या अन्ना का आन्दोलन सरकार का राह आसान तो नहीं कर रहे है या कहे अनजाने में अन्ना व उसकी टीम सरकार के लिए सेप्टी बॉल का काम तो नहीं कर रही है। जब अन्ना जंतर-मंतर पर अनशन शरु किया था तो सम्पूर्ण देश अन्ना के पिछे चल पड़ा था लग रहा था कि फिर देश को 1974 का दौर देखने को मिलेगा, क्या बच्चे क्या बूढे सभी अन्ना के पिछे खड़े थे सरकार बुरी तरह डरी हुई थी लेकिन अचानक भ्रष्ट्राचार के खिलाफ यह आन्दोलन खत्म हो जाता है क्योंकि सरकार अन्ना की जन लोकपाल बिल की मांग को मान लेती है और अन्ना अपना अनशन तोड़ देते है। सभी अपनी जीत की खुशी मनाकर घर चले जाते है पर स्थिती ज्यों की त्यों बनी हुई है।
कहने का तात्पर्य है कि सिर्फ लोकपाल बिल को ही मुद्दा बनाकर यह आन्दोलन कब तक चल सकता था, जन लोकपाल बिल एक मांग तो हो सकती थी लेकिन मात्र एक मांग नहीं। अन्ना को कालेधन, भ्रष्ट्राचार को भी आन्दोलन के मुद्दो में प्रमुखता से शामिल करना चाहिए था।
अगर अन्ना ने ऐसा किया होता तो 4 जून की घटना पहले ही घट गई होती। सरकार के लिए ये बड़ा आसान था कि वह उनकी मात्र इस मांग को मानकर आम जन के गुस्से को शांत कर दे। अन्ना को जे.पी की तरह सत्ता परिर्वतन के साथ व्यवस्था परिर्वता की राह पर चलना चाहिए था।
तीसरा सवाल दिलचस्प है। जब अन्ना ने जंतर-मंतर अपना अनशन किया था तो उन्होने अपने मंच पर किसी भी राजनैतिक पार्टी या जनप्रतिनिधि जिसे जनता ने चुनकर कर भेजा है नहीं आने दिया उनके लिए सभी राजनैतिक पार्टियां अछूत हो गई थी।
लेकिन फिर क्या जरुत आन पड़ी की अन्ना व उसकी टीम को उन्हीं लोगो के पास मिलने व लोकपाल पर चर्चा करने जाने पड़ा। अब उन्हे कैसे लगा की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी कही कोई भूमिका होती है। ये बात अन्ना को पहले ही समझ लेना चाहिए था कि अन्ना जिस गांधी जी के अनुयायी है वह सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे।
आखिर क्या देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है कि मात्र अन्ना की सिविल सोयायटि ही इसकी संजीवनी है। क्या विपक्ष पूर्णत पंगु हो चुका है कि वह अपने दायित्व का पालन नहीं कर सकता है। व्यवस्था का जितना भयावह रुप अन्ना टीम ने दिखाने का प्रयास किया है उतनी बुरी स्थिती अभी नहीं आई है। अन्ना को चाहिए की वह संपूर्ण विपक्ष को साथ लेकर चले।
अन्ना व उनकी टीम भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ खड़े होने वाले को सांप्रदायिकती के तराजू में तौल कर क्यों देखती है। उनके लिए संघ विचारधारा या संघ से जुड़ा हुआ व्यक्ति अछूत हो जाता है। ये अन्ना की टीम की कौन सी मापदंड है कि जो राम देव को शर्तो के आधार पर मंच पर आने के लिए कहती है। इस प्रकार से अन्ना व उनकी टीम सरकार का ही हाथ मजबूत करने का काम कर रही है। अन्ना को चाहिए की वह समाज के सभी वर्गो व विचारों जो भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध है साथ लेकर चले ।
इन सब के अलावा भी अन्ना की टीम की आलोचना की गई चाहे व प्रशान्त भूषण व उनके पिता की सम्पति विवाद हो या दोनो पिता-पुत्र को शामिल किया जाना हो। सवालो के घेरे में अन्ना भी आये उनकी मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया गया।
यह सही है कि सशक्त जन लोकपाल भ्रष्ट्राचार पर लगाम लगाने में कारगर सिद्ध होगा लेकिन इसके लिए आवश्यकता मजबूत राजनैतिक इच्छा शक्ति की, समाज के तमान वर्गो को साथ में लेकर चलने की न की किसी को अछूत समझने की ।
इन सभी के बाद भी अन्ना हजारे का योगदान समाज के लिए अतुलनीय है। बस आवश्यकता है कि अन्ना की टीम समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चले ताकि भारत को भ्रष्ट्राचार के दलदल से बाहर निकाला जा सके व भविष्य में इस पर लगाम भी लगाया जा सके।
यह आलेख वीर अर्जुन,बढास4मिडिया,हस्तकक्षेप,प्रवक्ता पर प्रकाशित हो चुका है.....
Wednesday, 29 June 2011
राहुल गांधी बनाम उत्तर प्रदेश
कांग्रेस राहुल में अपना भविष्य देखती है राहुल आते भी उत्तर प्रदेश से ही इस कारण भी यू.पी चुनाव काग्रेस के युवराज के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती काग्रेंस का खोया हुआ वोट बैंक वापस लाने की है जिसके लिए वह हर संभव प्रयास करते भी दिखे है कभी वह किसी अनुसुचित जाति के घर में रात बिताते है तो कभी किसानो का दर्द सुनने मोटर साईकिल पर बैठकर भट्टा पासौल गांव पहुंच जाते है। राहुल गांधी की टक्कर सीधे तौर पर सपा और सत्ता रुढ बसपा से है। राहुल को पार्टी के कमजोर हो चुके संगठनात्मक ढ़ाचे को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। राहुल गांधी को कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक को वापस लाने के कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
यू.पी का आगमी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के भविष्य की राह तह करने में अहम भूमिका निभायेगा साथ ही राहुल गांधी अगर इस चुनाव में सफल होने में कामयाब हो जाते है तो वह उन विरोधियों का मुह बंद कर देगें जो उन्हे अमूल बॉय समझते है।
Wednesday, 8 June 2011
सरकार का दमनचक्र

जिस तरह का बर्ताव रामलीला मैदान में सरकार ने शांति पूर्ण तरीके अनशन पर बठै सत्याग्रहियों के साथ किया है वह सरकार के कायरता का परिचय देता है। सरकार की बर्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होनें अनशन में शामिल महिलओं व बच्चो को भी नही बख्शा। संप्रग सरकार कानून व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों का दुरुपयोग करके के देश में जिस प्रकार लोकतांत्रिक विपक्ष व विरोध को दबाने की जो साजिश रची है निन्दनीय है. 4 जून 2011 की आधी रात में सो रहे लोगो ये कल्पना भी नहीं की थी कि यूपीए सरकार इस बेशर्मी व क्रूरता के साथ निर्दोष पुरुषों और महिलाओं के खिलाफ बल प्रयोग करेगी। इससे अधिक बेशर्मी व भयावह बात यह है कि कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने इस कार्यवाई न्यायोचित ठहरा है। पुलिस द्वारा की गई बर्वतापूर्ण कार्रवाई औपनिवेशिक काल के दौरान जलियावाला बाग में जनरल डायर द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारने के आदेश की याद दिलाता है।
जिस प्रकार 1977 के इसी महीने में जे.पी. आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया गया था ठीक उसी प्रकार का काम इस यू.पी.ए सरकार ने किया है। लोकतंत्र में विरोध जताना मौलिक अधिकार है, अपनी गलतियों को छिपाने के लिए बल का प्रयोग करना कायरतापूर्ण कृत है।
रात के सन्नाटे में जिस प्रकार से निह्ते लोगो पर आसु गैस के गोले दागे गये उन पर लाठी चार्ज किया गया मानों वह देश के नागरिक नही अपितु दुश्मन हो। वह लोग जो शांतिपूर्ण ढंग से भारत माता की जय एंव भष्ट्राचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे मानो उन्होने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया था। इन वीर पुलिस वाले की काम की प्रशंसना करनी चाहिए जिस प्रकार इन्होने अपनी वीरता का परिचय बेवस महिलाओ, बच्चो और बुर्जुगो पर लाठी चला कर दिखाया है। व तो हमें ऊपर वाले का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वहां कोई बड़ी बगदड़ नही मची क्योकि योग शिविर में भाग लेने आए सत्याग्रही काफी अनुशासित थे।
माननीय सर्वोच्य न्यायालय ने में इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सरकार एवं पुलिस प्रशासन से पूछा है कि आखिर क्यों आधी रात में अनशन कर रहे लोगो को हटाने की आवश्यकता पड़ी साथ ही सोते हुए लोगो पर बल प्रयोग करने की क्या जरुरत थी।
सरकार अपने इस कदम के बाद चारो तरफ से घिरती नज़र आय रही है। भा.ज.पा ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है राजघाट पर भा.ज.पा के तमान बड़े नेता एक दिन के अनशन में शामिल हुए इसके बाद आज वह राष्ट्रपति से मिली। देश के अन्य हिस्से में भी सरकार के इस कदम का जोरदार विरोध हो रहा है।
राम देव जी ने ऐलान किया है कि वह तब तक अनशन पर बैठे गे जब तक सरकार सम्पूर्ण मांगो को मान नहीं लेती है। दूसरी तरफ अन्ना ने भी सरकार के मुश्कीले बढा दी है। अन्ना ने जन्तर मन्तर पर अनशन करने का ऐलान कर दिया है सरकार चारो तरफ से ऐसे घिर गई है कि उसे अब समझ में नही आ रहा है कि इस पर क्या करे।
Tuesday, 10 May 2011
अब क्षमा नहीं अब रण होगा...
लेकिन क्या हमारी सरकार के पास इतनी इच्छा शक्ति है कि वह दाउद,टाईगर मेमन, व मुबई धामाकों मे शामिल देश के गद्दारो के खिलाफ कोई कठोर कदम उठा सके या अब भी हम सिर्फ अमेरिका को संतुष्ट करने में लगे रहेगे।
वहीं दूसरी तरफ अमेरिका हमारे साथ दोहरी नीति अपना रहा है एक ओर तो वह कहता है आंतक के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ दूसरी तरफ वह पाकिस्तान का साथ भी देता है जो कि भारत में आतंकी गतिविधयों के लिए जिम्मेबार है। अमेरिका के दोहरी नीति का आभास इस बात से भी लगता है कि हाल में अमेरिका ने कहा कि भारत में हुए हमले की तुलना अमेरिका पर हुए हमले से नहीं की जा सकती साफ शब्दों में अमेरिका पर हुआ हमला विश्व का सबसे बड़ा हमला और भारत पर हुआ आंतकी हमला कुछ भी नहीं। माफ कीजियेगा ओबामा जी लेकिन जितनी एक अमेरिकी जान की कीमत उससे कही ज्यादा भारतीय जान की कीमत है।
अब समय आ गया है कि भारत भी उन गद्धारो को जो कि भारत में अनगणित लोगों के दर्दनाक मौत के जिम्मेबार है उनकों उनके अजाम तक पहुंचाया जाये बेसक व विश्व के किसी कोने में छुप कर क्यों बैठे हो ताकि फिर कोई भारतीय सरजमीं की ओर बुरी नज़र से न देख सके।
Thursday, 21 April 2011
गैलप का साम्राज्यवादी एवं पक्षपातपूर्ण सर्वे
भारत, जहां पारिवारिक जीवन विश्व के किसी भी देश से उन्नत व खुशहाल स्थिति में है उस देश के नागरिक आर्थिक मामले में बेशक कहीं थोड़े कमजोर जरूर हो सकते हैं लेकिन मानसिक तौर पर अन्य देशों की अपेक्षा कहीं ज्यादा संतुष्ट व प्रसन्न हैं। पश्चिमी देश अपने अत्यंत वैभवशाली जीवन से इतने त्रस्त हो चुके हैं कि अब वे भारतीय जीवन दर्शन व परंपरा को अपनाने लगे हैं।
इसके बावजूद सर्वे द्वारा सिर्फ आर्थिक पक्षों के आधार पर पश्चिमी देशों की जीवन शैली को सर्वोच्च स्थान पर रखना एक पक्षीय एवं पक्षपातपूर्ण निर्णय है।
Tuesday, 8 March 2011
तू नारी नारायणी
कभी ममता की दायणी कभी चण्डी स्वरुप
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप........
तू ही इस जग में जीवन दायणी तू ही त्याग की परिचायका
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप.............
कभी तू ने मां बनकर हम सब का जीवन है तारा तो कभी बहना बनकर पग-पग पर तूने हमको है संभारा
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप...........
कभी मित्र बनकर जीवन के हर क्षण में तूने दिया सहारा
तो कभी जीवन साथी बनकर तू अपना सब कुछ हम पर है न्यौक्षारा
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप............
तेरे बलिदान को कोटी कोटी नमन है
जो न समझे तेरे वैभव को व सबसे बड़ा निर्धन है
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप........
तू जितनी तेजस्वनी होगी उतना ही जग चमकेगा
सही मान्ये में तेरे ही प्रगति से ये सारा गुल महकेगा
तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप तू नारी नारायणी तेरे अनगणित है रुप।
Tuesday, 14 December 2010
भ्रष्ट्राचार का 2010
2010 अपनी समाप्ति की ओर है, 2010 भारत के इतिहास में कभी न भुलाये जाने वाले अध्याय के रूप में जुड़ गया है । 2010 का साल एक ओर जंहा भारतवासियों को गौरवान्वित होने का मौका देता है तो वहीं भ्रष्ट्राचार का काला साया हमें शर्मसार होने पर मजबूर भी करता है। देश को जंहा इस साल ने खेलो में नए कीर्तिमान स्थापित करने का मौका दिया तो दूसरी तरफ इंही खेलो के आयोजन में हुए व्यापक भ्रष्ट्राचार ने अंतराष्ट्रिये पटल पर हमारी छवि को धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राजनेता से लेकर पत्रकार तक सरकार से लेकर विपक्ष तक सभी भ्रष्ट्राचार के दलदल में धंसे नज़र आये।
२ जी स्पेक्ट्रेम घोटाला हो या कर्नाटका का भूमि विवाद हर बार भारत का आम जन अपने को ठगा सा महसूस करने के लिए मजबूर था। आदर्श सोसायटी घोटाले ने भारत के अमर सपूत शहीदों को भी नहीं बक्शा उनके परिजनों को मिलने वाला आशियाना भी भ्रष्ट्राचार के इस दलदल ने नीगल लिया। लोकतंत्र का प्रहरी कह जाने वाला मिडिया भी इन सब से अछूता न रह सका नीरा राडिया प्रकरण से लोगो का विश्वास लोकतंत्र के इस प्रहरी से उठता नज़र आया।
2010 साल है जब न्यायपालिका भी संदेह के घरे में आती है देश सर्वोच्च न्यायलय किसी प्रान्त के उचतम न्यायलय के खिलाफ कठोर टिपणी करता है। भारत में आम जन अपना अंतिम सहारा न्यायलय को ही मानते है लेकिन इस प्रकरण से उनका विश्वास कंही न कंही कमजोर हुआ है ।जिन लोगो पर उत्तर देने की जिम्मेवारी है वही खामोश बठे है। जिसका दामन झाकने की कोशिश करो वहीं दाग नज़र आता है।
जाते जाते 2010 हमे सीख देकर जा रहा है की अब बहुत हो गया बहुत सह लिया अब बस अब फिर किसी धमाके की आवश्कता है क्योंकि बहरो को सुनाने के लिए धमाके की जरुरत होती है। यंहा दुष्यंत के कविता कि व लाइन ठीक प्रतीत होती है की-
हो गई है पीर पर्वत. सी पिघलनी चाहिएए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
विशेषकर युवाओ को आगे आना होगा इस भ्रष्ट्राचार से भारत को मुक्त करना होगा। सरकार अगर इन भ्रष्ट्राचारियो को सजा नहीं सुनाती है तो अब अगले पांच साल का इंतजार नहीं करके इन देशद्रोहियों को उनके अंजाम तक पंहुचाना होगा ताकि आने वाले समय में फिर कोई देश के साथ गद्दारी करने की हिम्मत न कर सके।
Saturday, 13 November 2010
बचपन की आस
मेरा भी मन करता है बारिश में कागज की नाव तेरानो को
ममी पापा के ऊँगली पकड़ कर सुबह सुबह स्कूल जाने को
दादा दादी के संग परियो की कहानी में डूब जाने को
शाम डले दोस्तों के साथ क्रिकेट व पतंग उड़ाने को ।
मेरा भी मन करता है बारिश में कागज की नाव तेरानो को ....2
मेरा मन भी पढने को करता है
पढ़ कर डॉक्टर टीचर इनजिनीर खूब खूब बड़ा बने को करता है
लेकिन सपने सपने तो आकिर सपने होते है
जो सुबह की किरणों के साथ टूट जाते है ।
मेरा भी मन करता है बारिश में कागज की नाव तेरानो को.....2
सुबह कोई आवाज लगाता है छोटू चल टेबल साफ कर दे
तू कोई कहता है छोटू चल गरम गरम चाय बना दे
कंही घर पर एक और जंहा बचपन सोता है
वंही घर के झाडो बर्तन करते करते छोटू तन्हाई मैं रोता है
छोटू छोटू के शब्दों मानो इनका निजी अस्तित्व कंही डूब गया हो
भारत के इस बचपन के सारे सपने टूट गया हो।
मेरा भी मन करता है बारिश में कागज की नाव तेरानो को...2
वह छोटू हमसे कुछ नहीं बस अपना बचपन मांग रहा है
जीवन के बस कुछ क्षण मांग रहा है
अगर हमें भारत को सही में समृद्ध बनाना है
तो भारत के इस बचपन को उसका बचपन लोटाना होगा ।



