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Friday, 4 May 2012

मंगलेश डबराल जी को खुला पत्र


आदरणीय मंगलेश डबराल जी,
मंगलेश डबराल जी  किसी कार्यक्रम में जाना या नहीं जाना यह अपका अपना फैसला है। आप भारत नीति प्रतिष्ठान के कार्यक्रम समान्तर सिनेमा, के गोष्ठी में अध्यक्ष के नाते आये थे। मैं भी श्रोताओं में था और कार्यक्रम के आयोजन से भी जुड़ा हुआ था। आपने जिस प्रकार से माफीनामा दिया और कार्यक्रम में भाग लेने को एक चुक बाताया उसे देखकर मुझे आश्चर्य एंव दुख दोनो हुआ। आपने कुछ ऐसी बाते कहीं जो तथ्यो से परे है।
1.       आपको  मैने ही प्रतिष्ठान का साहित्य भेट किया आपने उसे सहर्ष स्वीकार किया साथ ही आपने प्रतिष्ठान के कार्यो के प्रशंसा भी की ।
2.       आपने अपने उदबोधन में निदेशक का नाम बड़े सम्मान से लिया।
3.       प्रतिष्ठान द्वारा इस आयोजन की भी सराहना की ।
4.       विषय पर खुली चर्चा हुई।
कार्यक्रम के दौरान क्या आपको कही लगा की आप किसी प्रकार के दवाब में बोल रहे है? इसके बावजूद आपने प्रतिष्ठान को  व्यवसायिक संस्था नहीं है जो प्रमाण पत्र दिया वह आपकी integrity पर सवाल खड़ा करता है। आप अपने बंधुओ से सीधे माफ़ी मांग लेते तो कोई हर्ज नहीं था परंतु माफ़ी मांगने के क्रम मे आपने जो तर्क दिया वह आप जैसे श्रेष्ठ विद्वान के लिए उचित प्रतीत नहीं होता है। कार्यक्रम में आपका अभिनंदन हुआ, आपका परिचय दिया गया जिसमे आपके योगदान एवं व्यकित्तव की चर्चा की गई कार्यक्रम से पहले निदेशक के कमरे में अनेक लोगो के साथ आपने खुली चर्चा की इस दौरान क्या आपको लगा की आप पर विचारधारा थोपी जा रही है? आप कार्यक्रम के दौरान व बाद में भी पूर्ण संतुष्ट ऩजर आ रहे थे। कार्यक्रम के उपरान्त आपने श्रोताओं के साथ खुली चर्चा भी की। आपने स्वंय सार्वजनिक रुप से कहा था कि आप प्रतिष्ठान को आपके द्वारा संपादित दि पब्लिक एजेंडा की मेलिंग सूची में शामिल करेगें साथ आपने इसकी प्रति भी संस्थान के मानद निदेशक प़्रो राकेश सिन्हा जी को दी थी। जब मैं आप को नीचे आपकी गाड़ी तक छोड़ने गया था इस दौरान भी आपने कार्यक्रम को सार्थक बताया था। कार्यक्रम में भाग लेने के उपरांत मुझे जो प्रतीत होता है कि  प्रतिष्ठान ने तो शुद्ध शैक्षणिक व व्यवसायिक द़ष्टि में चर्चा का आयोजन किया था किंतु आपने ट्रेड यूनियन के दवाब में अपने विवेक समर्पण कर दिया जो आप जैसे महान साहित्कार को शोभा नहीं देता है।
नवनीत
यह पत्र जनसत्ता और महौला लाईव में भी प्रकाशित हो चुका है


Thursday, 5 April 2012

क्यों हाशिए पर हैं प्रगतिशील मुस्लिम विचारक ?

क्या धर्मनिरपेक्षता कट्टरपंथियों की बलि चढ़ जाएगी ? इसी सवाल को गंभीरता से उठाता हुआ यह आलेख भारत नीति प्रतिष्ठान की पाक्षिक उर्दू मीडिया समीक्षा न्यूजलेटर में प्रो० राकेश सिन्हा की सम्पादकीय से साभार प्रकाशित किया जा रहा है |

ढ़ाई दशक पहले एक असहाय महिला ने अपने अस्तित्व बचाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। पति से तलाक मिलने के बाद उसे जो ‘मेहर’ दिया गया था वह इंदौर से दिल्ली तक का किराया भी नहीं होता। नीचे से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उसके हक, सम्मान और अपेक्षाओं को मानवीय, नैतिक एवं संवैधानिक दृष्टि से उचित माना था। शाहबानो के इस केस ने भारतीय राजनीति एवं सामाजिक जीवन में भूचाल खड़ा कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने न्यायालय के फैसले को मुस्लिम पर्सनल लाॅ के मामले में हस्तक्षेप करार दिया और भारत की ‘सेकुलर’ सरकार ने उनके सामने घूटना टेक दिया। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व में वर्णित और अपेक्षित समान कानून संहिता ;Uniform Civil Code उसी दिन निष्प्रभावी एवं Dead Letter बना दिया गया। तुर्की ही नहीं दो दर्जन से अधिक इस्लामिक देशों ने ‘पर्सनल लाॅ’ को आधुनिकता, वैज्ञानिकता एवं परिस्थितियों के संदर्भ में फेर-बदल किया है। परंतु भारत में यह स्वीकार्य नहीं है। आचार्य जे.बी. कृपलानी ने हिंदू कोड बिल पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा था कि भारतीय राज्य भी सांप्रदायिक संगठनों की तरह व्यवहार कर रही है। यह एक समुदाय के लिए तो कानून में सुधार एवं संशोधन तो कर रही है। दूसरों को छोड़ रही है। इतिहास ने कृपलानी के इस कथन को यथार्थ बना दिया है। 2012 में महाराष्ट्र सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा एक विधेयक तैयार किया गया है। इसमें महिलाओं को आर्थिक रूप से पारिवारिक एवं सामाजिक स्तरों पर सबल बनाने का प्रयास किया गया है। उन्हें पति की संपत्ति में आधा हिस्सा का अधिकार दिया गया। इस विधेयक के अनुसार किसी वैवाहिक संपत्ति के क्रय-विक्रय में पत्नी की सहमति आवश्यक माना गया है। तलाक या बंटवारे की स्थिति में पत्नी को आधी संपत्ति पर हक देने की बात विधेयक में है।अभी विधेयक पर विचार-विमर्श होना था। परंतु ‘अल्पसंख्यक वीटो’ ने इसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया। लिहाजा विरोध उलेमाओं या कट्टरपंथियों से शुरू नहीं हुआ। राज्य के अल्पसंख्यक विभाग ने प्रस्तावित कानून का विरोध किया। तर्क था कि यह मुस्लिमों की संवेदनाओं को चोट पहुंचाएगा। अल्पसंख्यक विकास मंत्री नसीम खान ने विरोध की अगुआई की और राज्य सरकार ने घुटना टेक दिया। खान ने शरीयत के अतिरिक्त उसको पुष्ट करने वाले दो कानूनों Dissolution of Muslim Marriage Act 1939 और Muslim Women (Protection of Right on Divorce) Act 1986 का हवाला दिया। क्या भारतीय गणतंत्र, न्याय व्यवस्था और नारियों का अधिकार कट्टरपंथियों के मुताबिक परिभाषित होता रहेगा? यह राज्य पोषित सांप्रदायिकता नहीं तो और क्या है?एक दूसरी अहम घटना भी भारतीय गणतंत्र के लिए अमंगलकारी संकेत दे रहा है। पूरा विश्व एक नए प्रकार के खतरे के कारण अनिश्चितता में जी रहा है। यह है आतंकवाद का बढ़ता मंसूबा। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, आस्ट्रेलिया, बेल्जियमय और ब्रिटेन अपने-अपने तरीकों से इस संभावित खतरे से बचने के लिए बेफिक्र होकर कदम उठा रहे हैं। आतंरिक सुरक्षा को इन देशों में राजनीति का मोहरा नहंी बनने दिया गया है। न ही राज्य की नीतियों एवं सामाजिक दृष्टियों में कोई बड़ी खाई है। बेल्जियम का उदाहरण देखिए। आंतरिक सुरक्षा को देखते हुए जब वहां के सिनेट में बुर्का पर प्रतिबंध का विधेयक लाया गया तो 134 में 134 सदस्यों ने प्रतिबंध के समर्थन में मत दिया। सिर्फ दो सदस्य व्यक्तिगत कारणों से अनुपस्थित थे। भारत इन देशों का अनुकरण करे यह जरूरी नहीं है। परंतु आंतरिक सुरक्षा की अहमियत को तो कम से कम इससे समझा जा सकता है। जिस प्रकार आतंकवाद एवं आंतरिक सुरक्षा के प्रश्नों के साथ देश में निम्न स्तर की राजनीति हो रही है वह चिंता का विषय है। 13 फरवरी को इजराईल के एक कुटनीतिक के कार पर बम से हमला हुआ। सुराग मिलने पर 7 मार्च 2012 एक पत्रकार काजमी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने मीडिया के सामने भी कई तथ्यों को उजागर किया। परंतु बुद्धिजीवियों के एक वर्ग एवं उर्दू मीडिया ने उसकी गिरफ्तारी को मुस्लिम अस्मिता एवं अस्तित्व से जोड़ दिया। दिल्ली से देवबंद तक छोटी-बड़ी जगहों पर उसे ‘नायक’ की तरह प्रस्तुत कर उसे मुक्त किए जाने के लिए धरना, प्रदर्शन संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। गांव और कस्बों के मुसलमानों को किस प्रकार जगाया जा रहा है उसे दिल्ली से प्रकाश्ति ‘सहाफत’ के इस शीर्षक से जाना जा सकता है-”हिंदुस्तान में मुसलमान होना ही जुर्म हो गया है। काजमी का नाम अगर राम-कृष्ण होता तो उसके साथ यह सलूक नहीं होता।“ एक सामाजिक कार्यकर्ता जो ‘अनहद’ से जुड़ी है शबनम हासमी ने इसे राज्य का मुसलमानों पर कहर बताते हुए कहा कि ”पहले मौलवी फिर नौजवान और अब वरिष्ठ पत्रकारों पर निशाना।“ उर्दू अखबारों ने जो अभियान चलाया उसे देखिए। एक-एक दिन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए गए हैं। हिंदुस्तान एक्सप्रेस और हमारा समाज ने 12 मार्च के अंक में काजमी के समर्थन में छह-छह समाचार प्रकाशित किए। हमारा समाज ने दो-दिन बाद फिर पांच समाचार प्रकाशित किया तो इंकलाब ने उसी दिन छह समाचार प्रकाशित किया। रोजनामा राष्ट्रीय सहारा ने 14 मार्च को पांच समाचार छापा है। उर्दू टाइम्स ने तो लिख दिया कि ”इजराईल के खिलाफ नहीं लिखना वरना गिरफ्तार हो जाओगे।“ दिल्ली और देवबंद के कुलीनों के जिनमें अनेक प्रबुद्ध एवं जानी-मानी हस्तियां शामिल हैं के इस अभियान का आम मुसलमानों के मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या यह कार्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की एक साजिश तो नहीं है?इसका दूसरा आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के प्रश्नों पर राज्य एवं जांच एजेंसियां सांप्रदायिक ताकतों के दबाव में काम करेगी? दुर्भाग्य से मानवाधिकार से जुड़े कुछ संगठनों एवं लोगों ने इस अभियान को ताकत एवं वैधानिकता देने का काम किया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार आंतरिक सुरक्षा का इतने बड़े पैमाने पर सांप्रदायिकरण कर उसे समुदाय-चेतना को मजबूत करने का औजार बनाया गया है। अल्पसंख्यकवाद एक मगरमच्छ की तरह है जो कभी संतुष्ट नहंीं होता तभी संविधान सभा के उपाध्यक्ष डा. एच.सी. मुखर्जी (जो स्वयं आस्था से ईसाई मतावलंबी थे) ने संविधान सभा में चेताया था कि यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो किसी समुदाय को धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक नहीं मान सकते हैं। शाहबानों प्रकरण के ढ़ाई दशक बाद प्रगतिशील चिंतक-विचारक नेता आरिफ मोहम्मद खान ही नहीं तमाम प्रगतिशील मुस्लिम विचारकों चाहे ए.ए.ए. फैजी हों या मोइन शकीर या जस्टिस एम.एच. बेग की सोच-समझ हासिये पर हैं। ऐसा क्यों हुआ यह प्रश्न विचारणीय है। इस अंक में इन दो मुद्दों पर उर्दू अखबारों के समाचारों एवं लेखों का संक्षिप्त रूप विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है। एक सवाल हमारे सामने है क्या धर्मनिरपेक्षता कट्टरपंथियों की बलि चढ़ जाएगी?

(प्रो० सिन्हा भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक हैं | )

Tuesday, 5 July 2011

अन्ना हजारे, सिविल सोसायटी व जनलोकपाल बिल पर एक नज़र




आज सम्पूर्ण भारत में एक बात राजनीति का का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है लोकपाल बिल, अन्ना हजारे देश की हीरो बन चुके है। लेकिन जिस प्रकार सिक्के दो पहलु होते हैं उसी प्रकार हमें सिर्फ अन्ना व उनकी टीम के एक पहलू को नहीं देखना चाहिए की सब अच्छा ही अच्छा है। निश्चित तौर अन्ना का आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण है लेकिन इसमें कई सवाल ऐसे जिनका उत्तर ढूढ़ा जाना चाहिए। आज हम और हमारा समाज भ्रष्ट्राचार के दलदल में धंसा हुआ है और अन्ना हजारे इससे तारनहार के रुप में उभर कर सामने आये हैं तो यह इसलिए भी जरुरी हो जाता है कि इस आन्दोलन के अनछूये पहलुओं पर कुछ प्रकाश डाला जायें।
निम्नलिखित प्रश्नो के आधार पर अन्ना व उनकी टीम की समीक्षा करने का प्रयास किया जा सकता है।
1. क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम सिविल सोसायटी का चहेरा है ?
2. क्या अन्ना अनजाने में या जान बूझ कर सरकार की राह तो आसान नही कर रहे है इस आन्दोलन का भविष्य क्या है?
3. कभी अन्ना जनप्रतिनिधियों व राजनीतिक पार्टियों को अपनें आस-पास तक नहीं फटकने देते है तो कभी स्वंय ही उनके दरबार में पहुंच जाते है।
4. क्या देश के लोकतात्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है की अन्ना व उनकी टीम ही इसकी संजीवनी है?
5. अगर भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ आता है तो उसे सांप्रदायिकता व विचार के रंग में रंग कर क्यों देखा जाता है?

पहला सवाल अपने आप अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्या सिर्फ अन्ना व उनकी टीम ही सिविल सोसायटी है। अन्ना की टीम में अरविंद केजीरीवाल, किरण वेदी प्रशान्त भूषण व उनके पिता शांति भूषण प्रमुखता से दिखाई पड़ते है। क्या ये लोग 1 अरब आम जान का प्रतिनिधित्व करते है ये सोचने का विषय है। अभी भारत में ऐसी स्थिती नहीं आयी है कि कोई भी अपने आप को सिविल सोसायटी होने का दाबा कर सके। सिविल सोसायटी सम्पूर्ण समाज का प्रतिबिम्भ होता है समाज से जोड़े तमान वर्गो को मिला कर सिविल सोसायटी का स्वरुप तैयार होता है लेकिन अन्ना हजारे की सिविल सोसायटी में इसका अभाव दिखता है अन्ना व उनकी टीम किसी भी रुप मे सिविल सोसायटि तो नहीं कहा जा सकता है।

दूसरा सवाल है कि क्या अन्ना का आन्दोलन सरकार का राह आसान तो नहीं कर रहे है या कहे अनजाने में अन्ना व उसकी टीम सरकार के लिए सेप्टी बॉल का काम तो नहीं कर रही है। जब अन्ना जंतर-मंतर पर अनशन शरु किया था तो सम्पूर्ण देश अन्ना के पिछे चल पड़ा था लग रहा था कि फिर देश को 1974 का दौर देखने को मिलेगा, क्या बच्चे क्या बूढे सभी अन्ना के पिछे खड़े थे सरकार बुरी तरह डरी हुई थी लेकिन अचानक भ्रष्ट्राचार के खिलाफ यह आन्दोलन खत्म हो जाता है क्योंकि सरकार अन्ना की जन लोकपाल बिल की मांग को मान लेती है और अन्ना अपना अनशन तोड़ देते है। सभी अपनी जीत की खुशी मनाकर घर चले जाते है पर स्थिती ज्यों की त्यों बनी हुई है।
कहने का तात्पर्य है कि सिर्फ लोकपाल बिल को ही मुद्दा बनाकर यह आन्दोलन कब तक चल सकता था, जन लोकपाल बिल एक मांग तो हो सकती थी लेकिन मात्र एक मांग नहीं। अन्ना को कालेधन, भ्रष्ट्राचार को भी आन्दोलन के मुद्दो में प्रमुखता से शामिल करना चाहिए था।
अगर अन्ना ने ऐसा किया होता तो 4 जून की घटना पहले ही घट गई होती। सरकार के लिए ये बड़ा आसान था कि वह उनकी मात्र इस मांग को मानकर आम जन के गुस्से को शांत कर दे। अन्ना को जे.पी की तरह सत्ता परिर्वतन के साथ व्यवस्था परिर्वता की राह पर चलना चाहिए था।

तीसरा सवाल दिलचस्प है। जब अन्ना ने जंतर-मंतर अपना अनशन किया था तो उन्होने अपने मंच पर किसी भी राजनैतिक पार्टी या जनप्रतिनिधि जिसे जनता ने चुनकर कर भेजा है नहीं आने दिया उनके लिए सभी राजनैतिक पार्टियां अछूत हो गई थी।
लेकिन फिर क्या जरुत आन पड़ी की अन्ना व उसकी टीम को उन्हीं लोगो के पास मिलने व लोकपाल पर चर्चा करने जाने पड़ा। अब उन्हे कैसे लगा की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी कही कोई भूमिका होती है। ये बात अन्ना को पहले ही समझ लेना चाहिए था कि अन्ना जिस गांधी जी के अनुयायी है वह सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे।

आखिर क्या देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी सर-गल चुकी है कि मात्र अन्ना की सिविल सोयायटि ही इसकी संजीवनी है। क्या विपक्ष पूर्णत पंगु हो चुका है कि वह अपने दायित्व का पालन नहीं कर सकता है। व्यवस्था का जितना भयावह रुप अन्ना टीम ने दिखाने का प्रयास किया है उतनी बुरी स्थिती अभी नहीं आई है। अन्ना को चाहिए की वह संपूर्ण विपक्ष को साथ लेकर चले।
अन्ना व उनकी टीम भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध उनके साथ खड़े होने वाले को सांप्रदायिकती के तराजू में तौल कर क्यों देखती है। उनके लिए संघ विचारधारा या संघ से जुड़ा हुआ व्यक्ति अछूत हो जाता है। ये अन्ना की टीम की कौन सी मापदंड है कि जो राम देव को शर्तो के आधार पर मंच पर आने के लिए कहती है। इस प्रकार से अन्ना व उनकी टीम सरकार का ही हाथ मजबूत करने का काम कर रही है। अन्ना को चाहिए की वह समाज के सभी वर्गो व विचारों जो भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध है साथ लेकर चले ।
इन सब के अलावा भी अन्ना की टीम की आलोचना की गई चाहे व प्रशान्त भूषण व उनके पिता की सम्पति विवाद हो या दोनो पिता-पुत्र को शामिल किया जाना हो। सवालो के घेरे में अन्ना भी आये उनकी मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया गया।

यह सही है कि सशक्त जन लोकपाल भ्रष्ट्राचार पर लगाम लगाने में कारगर सिद्ध होगा लेकिन इसके लिए आवश्यकता मजबूत राजनैतिक इच्छा शक्ति की, समाज के तमान वर्गो को साथ में लेकर चलने की न की किसी को अछूत समझने की ।
इन सभी के बाद भी अन्ना हजारे का योगदान समाज के लिए अतुलनीय है। बस आवश्यकता है कि अन्ना की टीम समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चले ताकि भारत को भ्रष्ट्राचार के दलदल से बाहर निकाला जा सके व भविष्य में इस पर लगाम भी लगाया जा सके।
यह आलेख वीर अर्जुन,बढास4मिडिया,हस्तकक्षेप,प्रवक्ता पर प्रकाशित हो चुका है.....

Wednesday, 29 June 2011

राहुल गांधी बनाम उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आता जा रहा राजनैतिक गलियारे में हल-चल तेज हो गई है। जोड़-तोड़ नफा-नुकसान का आकलन किया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इस चुनाव में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की शाख दाव पर लगी है। कांग्रेस अपनी पूरी ताकत अपने युवराज के साथ लगा दिया है। एक समय था जब यू.पी. में कांग्रेस का एकतरफा राज था। कांग्रेस के खाते में sc/st व मुस्लीम वोट हुआ करते थे। लेकिन सफा और बसपा में इस वोट बैंक में सेंध लगा कर कांग्रेस का प्रभुत्व यू.पी. की राजनीति में शून्य कर दिया। उत्तर प्रदेश का भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है इसलिए सभी पार्टी अपना दबदबा बरकरार रखना चाहती है। पिछले कुछ विधानसभा चुनावों जिनकी सीधी जिमेबारी राहुल गांधी पर पर थी वहां काग्रेंस को कुछ खास न कर सकी। उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में राहुल का मैजिक कुछ खास नहीं चल पाया था अत आगामी विधानसभा चुनाव भी इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है।
कांग्रेस राहुल में अपना भविष्य देखती है राहुल आते भी उत्तर प्रदेश से ही इस कारण भी यू.पी चुनाव काग्रेस के युवराज के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती काग्रेंस का खोया हुआ वोट बैंक वापस लाने की है जिसके लिए वह हर संभव प्रयास करते भी दिखे है कभी वह किसी अनुसुचित जाति के घर में रात बिताते है तो कभी किसानो का दर्द सुनने मोटर साईकिल पर बैठकर भट्टा पासौल गांव पहुंच जाते है। राहुल गांधी की टक्कर सीधे तौर पर सपा और सत्ता रुढ बसपा से है। राहुल को पार्टी के कमजोर हो चुके संगठनात्मक ढ़ाचे को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। राहुल गांधी को कांग्रेस के परम्परागत वोट बैंक को वापस लाने के कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
यू.पी का आगमी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के भविष्य की राह तह करने में अहम भूमिका निभायेगा साथ ही राहुल गांधी अगर इस चुनाव में सफल होने में कामयाब हो जाते है तो वह उन विरोधियों का मुह बंद कर देगें जो उन्हे अमूल बॉय समझते है।

Wednesday, 8 June 2011

सरकार का दमनचक्र


जिस तरह का बर्ताव रामलीला मैदान में सरकार ने शांति पूर्ण तरीके अनशन पर बठै सत्याग्रहियों के साथ किया है वह सरकार के कायरता का परिचय देता है। सरकार की बर्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होनें अनशन में शामिल महिलओं व बच्चो को भी नही बख्शा। संप्रग सरकार कानून व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों का दुरुपयोग करके के देश में जिस प्रकार लोकतांत्रिक विपक्ष व विरोध को दबाने की जो साजिश रची है निन्दनीय है. 4 जून 2011 की आधी रात में सो रहे लोगो ये कल्पना भी नहीं की थी कि यूपीए सरकार इस बेशर्मी व क्रूरता के साथ निर्दोष पुरुषों और महिलाओं के खिलाफ बल प्रयोग करेगी। इससे अधिक बेशर्मी व भयावह बात यह है कि कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने इस कार्यवाई न्यायोचित ठहरा है। पुलिस द्वारा की गई बर्वतापूर्ण कार्रवाई औपनिवेशिक काल के दौरान जलियावाला बाग में जनरल डायर द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारने के आदेश की याद दिलाता है।
जिस प्रकार 1977 के इसी महीने में जे.पी. आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया गया था ठीक उसी प्रकार का काम इस यू.पी.ए सरकार ने किया है। लोकतंत्र में विरोध जताना मौलिक अधिकार है, अपनी गलतियों को छिपाने के लिए बल का प्रयोग करना कायरतापूर्ण कृत है।
रात के सन्नाटे में जिस प्रकार से निह्ते लोगो पर आसु गैस के गोले दागे गये उन पर लाठी चार्ज किया गया मानों वह देश के नागरिक नही अपितु दुश्मन हो। वह लोग जो शांतिपूर्ण ढंग से भारत माता की जय एंव भष्ट्राचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे मानो उन्होने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया था। इन वीर पुलिस वाले की काम की प्रशंसना करनी चाहिए जिस प्रकार इन्होने अपनी वीरता का परिचय बेवस महिलाओ, बच्चो और बुर्जुगो पर लाठी चला कर दिखाया है। व तो हमें ऊपर वाले का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वहां कोई बड़ी बगदड़ नही मची क्योकि योग शिविर में भाग लेने आए सत्याग्रही काफी अनुशासित थे।
माननीय सर्वोच्य न्यायालय ने में इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सरकार एवं पुलिस प्रशासन से पूछा है कि आखिर क्यों आधी रात में अनशन कर रहे लोगो को हटाने की आवश्यकता पड़ी साथ ही सोते हुए लोगो पर बल प्रयोग करने की क्या जरुरत थी।
सरकार अपने इस कदम के बाद चारो तरफ से घिरती नज़र आय रही है। भा.ज.पा ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है राजघाट पर भा.ज.पा के तमान बड़े नेता एक दिन के अनशन में शामिल हुए इसके बाद आज वह राष्ट्रपति से मिली। देश के अन्य हिस्से में भी सरकार के इस कदम का जोरदार विरोध हो रहा है।
राम देव जी ने ऐलान किया है कि वह तब तक अनशन पर बैठे गे जब तक सरकार सम्पूर्ण मांगो को मान नहीं लेती है। दूसरी तरफ अन्ना ने भी सरकार के मुश्कीले बढा दी है। अन्ना ने जन्तर मन्तर पर अनशन करने का ऐलान कर दिया है सरकार चारो तरफ से ऐसे घिर गई है कि उसे अब समझ में नही आ रहा है कि इस पर क्या करे।

Tuesday, 10 May 2011

अब क्षमा नहीं अब रण होगा...

ओसामा बिन लादेन के मौत के तुरंत बात भारतीय समाचार पत्रों में भारत के थल सेना प्रमुख के बयान आया कि हम भी अमेरिका की तर्ज पर खोफिया अभियान चला सकते है। यह बयान इस ओर सकेंत करता है कि हमारी सेना सक्षम व आतुर है पाकिस्तान में छुपे हुए देश के दुश्मन का सफाया करने के लिए। यहां जरुत है सिर्फ राजनैतिक इच्छा शक्ति की। भारतीय थल सेना प्रमुख ने बातो ही बातो में इशारा कर दिया है कि अगर उन्हें मौका मिलता है तो वह पाकिस्तान के सरजमी पर घुस कर भारत के दुश्मनों का सफाया कर देगें।

लेकिन क्या हमारी सरकार के पास इतनी इच्छा शक्ति है कि वह दाउद,टाईगर मेमन, व मुबई धामाकों मे शामिल देश के गद्दारो के खिलाफ कोई कठोर कदम उठा सके या अब भी हम सिर्फ अमेरिका को संतुष्ट करने में लगे रहेगे।

वहीं दूसरी तरफ अमेरिका हमारे साथ दोहरी नीति अपना रहा है एक ओर तो वह कहता है आंतक के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ दूसरी तरफ वह पाकिस्तान का साथ भी देता है जो कि भारत में आतंकी गतिविधयों के लिए जिम्मेबार है। अमेरिका के दोहरी नीति का आभास इस बात से भी लगता है कि हाल में अमेरिका ने कहा कि भारत में हुए हमले की तुलना अमेरिका पर हुए हमले से नहीं की जा सकती साफ शब्दों में अमेरिका पर हुआ हमला विश्व का सबसे बड़ा हमला और भारत पर हुआ आंतकी हमला कुछ भी नहीं। माफ कीजियेगा ओबामा जी लेकिन जितनी एक अमेरिकी जान की कीमत उससे कही ज्यादा भारतीय जान की कीमत है।

अब समय आ गया है कि भारत भी उन गद्धारो को जो कि भारत में अनगणित लोगों के दर्दनाक मौत के जिम्मेबार है उनकों उनके अजाम तक पहुंचाया जाये बेसक व विश्व के किसी कोने में छुप कर क्यों बैठे हो ताकि फिर कोई भारतीय सरजमीं की ओर बुरी नज़र से न देख सके।

Thursday, 21 April 2011

गैलप का साम्राज्यवादी एवं पक्षपातपूर्ण सर्वे

आज भारत के तमाम समाचारपत्रों में गैलप द्वारा दुनिया के 124 देशों में बेहतर जीवन से संबंधित सर्वे प्रकाशित किया गया। इस सर्वे में भारत को 71वां स्थान दिया है जो कि गैलप की साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। पाकिस्तान जो कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, जहां का आमजन आर्थिक एवं मानसिक दोनों रूप से परेशान है उसे भारत से ऊपर 40वां स्थान देना इस सर्वे की सत्यता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है। जहां संपूर्ण पश्चीमी जगत अपने उन्नत जीवन से थक-हार कर शांति के लिए भारतीय परंपरा व जीवन दर्शन की ओर देखता है, उस भारत को 71वां स्थान देना तर्क संगत ही नहीं अपितु अनुचित भी है। सर्वे के आधार पर पश्चिमी देशों को सर्वोच्च स्थान पर रखना भी सर्वे के साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है।


भारत, जहां पारिवारिक जीवन विश्व के किसी भी देश से उन्नत व खुशहाल स्थिति में है उस देश के नागरिक आर्थिक मामले में बेशक कहीं थोड़े कमजोर जरूर हो सकते हैं लेकिन मानसिक तौर पर अन्य देशों की अपेक्षा कहीं ज्यादा संतुष्ट व प्रसन्न हैं। पश्चिमी देश अपने अत्यंत वैभवशाली जीवन से इतने त्रस्त हो चुके हैं कि अब वे भारतीय जीवन दर्शन व परंपरा को अपनाने लगे हैं।

इसके बावजूद सर्वे द्वारा सिर्फ आर्थिक पक्षों के आधार पर पश्चिमी देशों की जीवन शैली को सर्वोच्च स्थान पर रखना एक पक्षीय एवं पक्षपातपूर्ण निर्णय है।