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Friday, 7 May 2010
आखिर अपने अंजाम तक पहुंचा कसाब
Thursday, 8 April 2010
दंतेवाडा का लाल अजगर
अगर हमे नक्सलियों को मात देनी है तो हमे उनके मनोबल को तोडना होगा इसके लिए जरुरी है की सबसे पहले जो सहायता व समर्थन उन्हें समाज से मिल रहा है उस पर अंकुश लगाया जाये।
दंतेवाडा में मओवादियो द्वारा हमले में मारे गए भारत के अमर सपूतो को सत सत नमन
अमर सपूतो का बलिदान याद रखेगा हिंदुस्थान
Thursday, 4 March 2010
राशन की लाइन
सोचा चलो सरकारी दुकान से राशन ले आते है,
कुछ पैसे बचाते है
सरकार की मेहरबानियो का हम कुछ फायदा उठाते हैं ।
यह सोचकर मैं सरकारी दुकान की ओर चल पड़ा
देखकर राशन की लम्बी लाइन मेरा होश उड़ा
फिर भी मैंने मन को हिम्मत बडाई चलो आज राशन ले आये भाई
यह सोचकर मैं होगया सबसे आखिर में खड़ा ।
मेरे आगे खड़े थे एक वृद्ध व्यक्ति उनके आगे खड़ी थी एक महिला
वह महिला पीछे पलटी थोडा मुस्कराई बोली बाबा कर लो अगले जन्म की तैयारी
लगता नहीं आये गी इस जन्म आपके राशन की बारी,
बाबा भी थोडा मुस्कराए बोले
भूख तो आखिर ले ही ले गई जान, क्यूँ न राशन के आश में प्राण गावऊँ
शायद ऊपर जाते जाते ही कुछ राशन पाजाऊं ।
इतने मैं राशन की लाइन थोड़ी सी आगे चली
तो मरे मन में भी राशन की आश बड़ी
मैंने सोचा समय बिताने के लिए कुछ किया जाये , क्यूँ न मंगाई पर चर्चा ही हो जाये
आखिर कवि हूँ वक्त की बर्वादी से डरता हूँ, समय का पूरा सदउपयोग करता हूँ।
चर्चा हो गई शुरू एक महाशय ने कहा मंगाई से आम जन त्रस्त हैं
मैं कहा फिर भी सरकार तो मस्त है।
पीछे से आवाज आई क्या बताएं कमर तोड़ मंगाई है
मैं कहा झूठ है झूठ है सरकार तो कहती है इसमें कंहा सचाई है
हमार ग्रोथ रेट तो पहले से भी हाई है।
सरकार तो मुफ्त में सलाह देती है ,चीनी कम खाओ व डॉक्टर के पैसे बचाओ
गाड़ी में चलने की क्या जरूरत है , पैदल चल के अपना सेहद बनाओ।
तभी किसी ने जोड़ दिए सरकार को खर्चो मैं कटोती करनी चाहिए
मैं कहा सरकार कटोती तो कर रही है आम जन के ताली से सब्जी की कटोती,
रोटी की कटोती, उनके पकवानों से मिठास की कटोती
शुक्र है अभी इंसानों की बाड़ी नहीं आई है
अभी कंहा मंगाई है।
तभी दुकान से आवाज आई जाओ जाओ राशन खत्म हो गया भाई
ये सुनकर लोग शोर मचाते है,तभी वहां मंत्री जी आते है
एक बार फिर वादों का बिगुल बजाते है, कहते है
इस बार तो कम दामो पर राशन दिया है, अगली बार हमे फिर
से जिताओगे तो मुफ्त में राशन पाओगे ।
आखिर हार कर मैं घर को वापस आ जाता हूँ
शायद कभी न खत्म होने वाली इस राशन की लाइन से मुक्ति चाहता हूँ
अंत में आपसे जानना चाहता हूँ,
आखिर कब तक आम जन भूखे पेट सोये गा
व भूखे पेट मर जायेगा
आखिर कब खत्म होगी भूख से आम जनता की लड़ाई.......
Thursday, 25 February 2010
पब्लिक तुम संघर्ष करो कोई तुम्हारे साथ नहीं
कहत देवेश और नवनीत सुन भाई पब्लिक अपनी नीत
खड़ा करो ऐसा प्रतिनिधित्व जो सबको माने अपना मीत
उंच नीच जाति वेश भाषा को छोड़ कर सबसे ऊपर देश {भारत} की प्रीत
पब्लिक तुम संघर्ष करो कलम तुम्हारे हाँथ हैं, पब्लिक तुम संघर्ष करो कलम तुम्हारे हाँथ हैं
Monday, 25 January 2010
आखिर कब लोटेंगे गुलमर्ग की वादियों में अपने घर कश्मीरी पंडित (२० साल वनवास के )
कश्मीर व कश्मीर की समस्याओं के लिए हमारे देश का कथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग निरंतर प्रयास करता रहता हैं जिसका जीवंत उदहारण कश्मीर को अधिक स्वायता देने की मांग करता हुआ जस्टिस शगीर अहमद की रिपोर्ट हैं । मगर इस प्रकार के बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा कश्मीरी पंडितो के घर वापसी को लेकर न तो किसी प्रकार की मांग उठाई जाती है नहीं कोई संवेदना या प्रतिक्रिया ही सामने आती है । अगर कोई इस प्रकार का प्रयास करता भी है तो उसे सांप्रदायिक कहा जाता है।
भारत जहाँ भगवान् श्री राम को भी 14 वर्ष के वनवास के बाद घर वापसी का स्वभाग्य प्राप्त हो गया था। उसी देश में कश्मीरी पंडितो को अपने घर कश्मीर को छोड़े हुए २० वर्ष बीत गए लेकिन घर वापसी की राह अभी भी अंधकारमय है । लगभग 7 लाख कश्मीरी परिवार भारत के विभिन्न हिस्सों व् रिफूजी कैम्प में शरणार्थियो की तरह जीवन बिताने को मजबूर है। लेकिन इनका दर्द लगता है शासन कर्ताओं को नज़र नहीं आता शायद इसलिए इनके पुनर्वसन के लिए ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। लेकिन इनकी उदारता तो देखिये अपने ही देश में शरणार्थियो की तरह जीवन व्यतीत करने के बाद भी भारत में इनकी आस्था कंही से कमजोर नहीं हुई है दूसरी तरफ अलगाववादी हैं जिन्हें सरकार के तरफ से हर सुविधांए प्रदान की जाती है फिर भी वह भारत को अपना देश नहीं मानते और कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रचते रहते हैं इसके बाद भी वह कश्मीर में शान के साथ रहते है। कश्मीरी पंडितो को नाराजगी सिर्फ सरकार से नहीं है उनकी आंखे कुछ सवाल हमसे भी पूंछती हैं कि क्या हमें भी उनका दर्द नहीं दिखाई देता ? अगर दिखता है तो हम मौन क्यों हैं, इन सवालो का जवाब अपने अन्दर खोजना होगा की कश्मीरी पंडितो को हमारे सदभावना की नहीं हमारे प्रयासों की आवश्कता है ।
डल झील व गुलमर्ग के फूलो की खूबसूरती बिना कश्मीरी पंडितो के अधूरी है। कश्मीर फिर से सही मान्ये धरती का स्वर्ग तभी बन पाएगा जब कश्मीरी पंडितो की सुरक्षित घर वापसी हो जाएगी और घाटी एक बार फिर कश्मीरी पंडितो के मन्त्र उचारण से गुजने लगेगी........