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Wednesday 6 October 2010

अयोध्या विवाद सुलह के कगार पर पहुँच कर उलझता हुआ

देश के अखंडता व एकता से जुड़ा हुआ अब तक सबसे बड़ा फैसला अयोध्या विवाद पर ६० वर्ष के लम्बे अन्तराल के बाद आखिरकार इलाहबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ बेंच ने अपना फैसला सुना दिया। जब फैसला आया तो लगा मानो अब ये विवाद सुलज जायेगा क्योंकि फैसला था ही ऐसा जिसमे न तो किसी पक्ष कि हार हुई थी न ही किसी पक्ष कि जीत अदालत ने विवादित भूमि को तीनो पक्षों में बाट दिया दूसरे शब्दों कहे तो अदालत ने दोनों समुदायों के बिच सुलह के लिए मार्ग प्रस्तुत कर दिया।

अर्थात अदालत ने अपने फैसले से जंहा एक ओर करोडो हिदुओ की आस्था का ख्याल रखा वंही दूसरी तरफ मुस्लिमो के जख्मों को भी भरने का सफल प्रयास किया। अदालत के इस फैसले का दूसरा पक्ष भी है इस फैसले ने अयोध्या विवाद पर राजनीती करने वालो कि दुकान बंद कर दि तभी शायद उनको ये फैसला पचाने में मुस्किल हो रही है।

अब इस प्रकार के लोग जो नहीं चाहते है कि इस विवाद का कभी पूर्ण हल निकल सके इसीलिए व इसे फिर से अदालत में ले जाना चाहते है ।अगर ये विवाद पुनः अदालत में गया तो ये एक बार फिर राजनीती का अखाडा बन जाये गा । अब आवश्कता है दोनों पक्षों को बैठ कर इस विवाद को सुलझाने की यंहा दुष्यंत के कविता कि व लाइन ठीक प्रतीत होती है की

हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

अब बहुत हो गया अब इस विवाद का पूर्ण हल निकलना ही चाहिए हल भी एसा जो दोनों पक्षों को पूर्ण तह मनाये हो। हम सब आम भारतवासियों को चाहे व मुस्लिम हो या हिन्दू इन हुक्मरानों से गुजारिश करनी चाहिय कि अब बस इस मुद्दे को और राजनीती में न घसीटे मानिये उच्च न्यायलय ने जो सुलह का सुनेहरा अवसर प्रदान किया है उसका अनुसरण करते हुए इस विवाद का पूर्ण व स्थायी हल निकाले।

नहीं तो अयोध्या विवाद सुलह के कगार पर पहुँच कर उलझता चला जायेगा और हम यह सुनहेरा मोका गँवा देंगे।

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